श्रेणी: सतमेझरा

गद्दारी का बहाने बतंगड़ चिन्तन (बतंगड़ – 6)

– ओ. पी. सिंह एह घरी गद्दारी चरचा में बा आ कुछ लोग एकरा के आपन मौलिक अधिकार बतावे लागल बा. अइसनका लोग पाकिस्तान का हित में बतियावल आपन शान समुझत बा. सरसरी निगाह से देखनी त बुझाइल कि एह पर कुछ लिखल भा बोलल बहुते आसान रही...

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टेंशन दीहल जाला, लीहल ना जाव ! (बतंगड़ – 5)

– ओ. पी. सिंह टेंशन दीहल जाला, लीहल ना जाव. जिनिगी का हर मैदान में ई रणनीति मजगर साबित होले बशर्ते रउरा मे बेंवत होखे सोझा वाला के टेंशन दे सके के. ब्लफ मारत खाली फँउके ला फँउके वाला के ई चाल उलुटो पड़ सकेला. जइसे कि अब...

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भर घर देवर, भतारे से ठट्ठा (बाति के बतंगड़ – 4)

– ओ. पी. सिंह भर घर देवर, भतारे से ठट्ठा. कहाउत पुरान ह. जब ना त हम रहनी, ना मोदी जी. बाकिर हालही में मोदी जी के एगो बयान सुनि के मन में इहे कहउतिया याद पड़ गउवे. मोदी जी के दुश्मनन के कमी नइखे बाकिर पता ना का सोचि के ऊ...

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पइसल आ पसार (बतकुच्चन – 203)

बात के खासियते होला कहीं से चल के कहीं ले चहुँप जाए के. कहल त इहो जाला कि एक बार निकलल ध्वनि हमेशा खातिर अंतरिक्ष में मौजूद हो जाले. आजु पइसार आ पसार के चरचा करे बइठल हम त पसोपेश में बड़ले बानी कि कहाँ से शुरु कइल जाव. काहे कि...

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बाति के बतंगड़ – 1

कहल जाला कि बाते से आदमी पान खाला आ बाते से लातो खाला. एके बतिया केहू के मजाक लागेला आ केहू के आपन बेइज्जति. भोजपुरी में बहुते कहाउत बाड़ी सँ जवनन के आजु के सामाजिक हालात में दोहरावल ना जा सके. खास क के ऊ सब कहाउत जवना में समाज...

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