नारी
– अभयकृष्ण त्रिपाठी पहचान के जरुरत नइखे हम नारी बानी मानी न मानी हर केहु पर भारी बानी || लुट रहल बा अस्मत चारो ओरि, जानत बानी, नारी भइल नारी के दुसमन इहो मानत बानी, कोख मारीं आ सर तान के केतनो चलीं रउआ जग के जनावर से परिचय...
Read More– अभयकृष्ण त्रिपाठी बीत गइल शिवरात्रि बाबा नाही अइलऽ तू, पडल रह गइल भांग धतूरा नाही खइलऽ तू | का दिल्ली का कलकत्ता का काशी का मथुरा, तोहरा आड़ में खा रहल बा हर केहू भांग धतूरा, जहर के खाके जहर उगीलत नाही देखलऽ तू, बीत गइल...
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