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– प्रो. शत्रुघ्न कुमार

जानत नइखी टपके लागेला
कहवा से ई शब्दन के बूंद
लेके हथवा में लेखनी
सोचे लागिला जब जब,
बन जाला सदा कगजवा पर अक्षर
उहे बूंद सादा कगजवा पर तब-तब.

पढ़ एकरा केहू कही
नइखे एकरा में कोई बात
लिखले बाड़े ई महराज
आपन-आपन, सब आपन बात.

बाकिर पढ़ एकरा के
कहिहे ऊ सब लोग
बा एकरो में ऊ सबके
दुःख दरद के बात
कइले बाड़े बेबस जिनका के
सहे खातिर दुःख दर्द के बात.

लिखत जाईब तब-तक ले
दुःख दरद के ई बात
रही असमानता समाज में जब तकले.
रही असमानता समाज में जब तकले.


(कवि भोजपुरी भाषा, साहित्य औरी सांस्कृतिक केंद्र, इंदिरा गाँधी राष्ट्रिय मुक्त विश्वविदालय के निदेशक बानी. अपने के इग्नू में ही हिंदी के प्रोफ़ेसर बानी. अपने के हिंदी औरी भोजपुरी में कविता औरी आलेख आदि कई गो पत्र पत्रिका में प्रकाशित बा.)

1 Comment

  1. amritanshuom

    प्रोफ़ेसर साहब राउर शब्दन के बूंद में
    बहुत बड़ा गहराई लउकत बा .

    ओ.पी . अमृतांशु

    Reply

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