Tag: रामरक्षा मिश्र विमल

जिउतिया (जीवित्पुत्रिका) : चिरंजीवी संतान के ब्रत

– रामरक्षा मिश्र विमल (-अबकी 23 सितंबर 2016 के जिउतिया व्रत पड़ल बा. एह मौका पर पहिले से प्रकाशित आलेख कुछ नया चित्र का साथे दुबारा दिहल जात बा. एह चित्रन का साथे विमल जी लिखले बानी कि एह तरह के लेखन आ सामग्रियन के जुटावे आ...

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भारतीय संस्कृति के संवाहक रक्षाबंधन के अस्तित्व संकट

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल सावन के पुरनवासी के इंतजार हर घर के होला काहेंकि एह दिन देश भर में राखी के तेवहार मनावल जाला. राखी माने रक्षाबंधन. ई हिंदू धर्म के लोकप्रियता के कमाल हटे कि रक्षाबंधन के तेवहार के विस्तार हिंदू...

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जबले हरियरी रही, कजरी गवात रही

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल चाहे शहर होखे भा गाँव आ गाँव में त अउरी, सावन के महीना आवते शुरू हो जाला लइकन के कबड्डी, खो-खो, चीका आ फनात के मजदार खेल. शहर-ओहर में त लइकियो ईहे गेमवा खेलेली सन बाकिर गाँव अबहिंयो एगो परंपरा का...

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गजल : बतावल लोग के औकात जाता रोज कुछ दिन से

– रामरक्षा मिश्र विमल शहर में घीव के दीया बराता रोज कुछ दिन से सपन के धान आ गेहूँ बोआता रोज कुछ दिन से जहाँ सूई ढुकल ना खूब हुमचल लोग बरिसन ले उहाँ जबरन ढुकावल फार जाता रोज कुछ दिन से छिहत्तर बेर जुठियवलसि बकरिया पोखरा के...

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