सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-57
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
लूर-लच्छन

आजु काकी लभेरन से बतियावे शुरुए कइली कि मनराखन मिसिरो चहुँपि गइले। काकी एह बात के लेके बहुत चिंतित रही कि काल्हु जब ऊ डॉक्टर किहाँ से फिजियोथिरेपी कराके ऑटो में बइठली त देखली कि एगो लइका बाइक प बइठल हाथ चमका-चमका के केहूँ से बतियावत रहे, जबकि ओकरा अँजरा-पँजरा केहू लउकत ना रहे। जब ऑटोवाला तीन-चार बेरि हॉर्न बजवलसि तब जाके ऊ बाइक स्टार्ट कइलसि आ भरि रास्ता अजीब-अजीब हरकत करत चलत जात रहे। बुझाते ना रहे कि लइकवा नॉर्मल बा कि ऐबनॉर्मल। देखिके डरो लागत रहे कि कवनो गाड़ी जनि ठोकि देउ ओकरा के।
अतना सुनते मनराखन चाचा बोलि परले- “अपने के एकदम सहिए नस धइले बानी। आजु-काल्हु राह चलत मनई के देखिके ई कहल मुश्किल बाटे कि ऊ होश-हवास में बा कि ओकरा के कवनो बेमारी धइले बा। लोग-बाग कान में छोटहन खूँटी नियन ईयरफोन खोँसि के हवा में बतियावत, मुसुकात आ कबो-कबो खिलखिला के हँसत आ कबो-कबो खिसिया के जोर-जोर से चिचियात चल रहल बाड़न। तनिका दूर से देखला पर त साफ बउराहे जनातरन। जो उनुका से बतियाईं जनि त एगो पागल के मए लच्छन उनुका में मिलि जाई।” अतना प काकी बोले शुरू कइली-
“पहिले के एगो अलगे लूर-लच्छन रहे। पहिले के लोग दलान, चउपाल भा ओसारा पर बइठ के चार लोग के सोझा बतियावत रहे। सुख-दुख बाँटल जात रहे, आँख से आँख मिला के बात होत रहे। मरद-मेहरारू आ लइका-लइकी का चाल-ढाल में एगो धीरज, मर्यादा आ संकोच लउकत रहे। रस्ता चलत खा लोग आसपास के पेड़-पौधा, चिरई-चुरुंग आ राहगीर- सभके देखत-देखावत आ मिलत-मिलावत चलत रहे। आजु के पीढ़ी खातिर त बाहरी दुनिया जइसे खतमे हो गइल बिया। आँखि स्क्रीन पर आ कान में ईयरफोन भा ब्लूटूथ। इनका अपना माई-बाप भा बगल में बइठल चाचा-चाची भा भाई-बहिन से बात करे के फुरसत नइखे, बाकिर हजार कोस दूर बइठल अनजान से घंटन दाँत निपोरि के बेसरम नियन बतियावे में तनिको हरज नइखे। लइका से बड़-बूढ़ तक सभे दुनिया से जइसे कट गइल बा आ खाली आभासी दुनिया के गुलाम बनि के रह गइल बा।”
मनराखन चाचा खइनी मलत बोलले आ बगल के डँड़ारि ध के बलिहारि ओरि निकलि गइले- “पहिले के लोगन का लूर-लच्छन में सादगी, धैर्य, संतोष आ अपनापन ढेर लउकत रहे। जीवन में साधन भलहीं कम रहे, बाकिर संबंधन का गरमाहट में कमी ना रहे। केहूँ का घरे जो पाहुन भा कवनो हीत-नात आ जाइ त सभ आपन सौभाग्य समझे। आस-पास के लोगन का सुख-दुख के आपन सुख-दुख माने के परंपरा रहे। गाँव-मोहल्ला में केहूँ का घरे शादी-ब्याह होखे भा बेमारी-हेमारी होखे त लोग बे बोलवले सहायता खातिर चहुँपि जात रहन। पहिले के लोग बात के पक्का मानल जात रहन। बात-बात में एग्रिमेंट आ रजिस्ट्री ना होत रहे। संबंध में औपचारिकता कम आ आत्मीयता ढेर होत रहे। अतने ना, ओह लोगन के कम से कम में काम चला लेबे के लूरियो रहे। एकरा ठीक उल्टा आजु का लोग के लूर-लच्छन में व्यावहारिकता आ आत्मनिर्भरता ढेर बढ़ि गइल बा। एकरा अलावे, स्त्री-पुरुष के संबंध होखे भा शिक्षा, रोजगार आ व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बात होखे- आजु का सोच में ढेर खुलापनो आइल बा।”
लभेरन कहले- “खुलापन त ठीक बा, बाकिर तनी ईहो सोचीं काकी कि एह मोबाइल आ ईयर फोन के सेहत पर कतना खराब असर परत बा। लगातार 70-80 डेसिबल से ऊपर कान के परदा पर आवाज ठोकइला से कान के नस कमजोर होतारी सन। नवही उमर में लोगन के ‘टिनिटस’ (कान में साँय-साँय के आवाज) आ कम सुनाई देबे के समस्या हो रहल बा। अतने ना मानसिक तनाव आ अनिद्रा के बेमारी अलगा से। कान में हर घरी भनभनाहट आ स्क्रीन का चकाचौंध से दिमाग के आराम नइखे मिलत। एकरा चलते चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन आ अनिद्रा (नींद ना आवे के बेमारी) तेजी से बढ़ रहल बा।”
अतने में काकी के बड़का नतिया बोल परल- दादी, सड़को दुर्घटना के खतरा बढ़ि गइल बा। रस्ता चलत घरी कान बन्न रहला से गाड़ी के हॉर्न भा ट्रेन के सीटी कुछुओ सुनाई ना परेला। टीवी प अइसन कई गो निउज देखे के मिलल कि लोग ईयरफोन का चलते आपन जान गँवा बइठल।
काकी चिंतित त रहबे कइली, अब गंभीर हो गइली आ लभेरन से पुछली- “एह समस्या से बाँचहूँ के कवनो उपाय बा कि ना? होखे त बताव।”
लभेरन कहले- “अपना प संजम राखे के परी। ईयरफोन के आवाज कबो 60 प्रतिशत से जादे जनि राखल जाउ आ एक बेर में 60 मिनट से बेसी ईयरफोन के इस्तमाल जनि कइल जाउ। रस्ता चलत घरी, गाड़ी चलावत घरी भा रेलवे ट्रैक का अँजरा-पँजरा ईयरफोन भा ब्लूटूथ कान में से निकालि के बगली में ध लिहल जाउ। अतने ना दिन भर में कम से कम दू-तीन घंटा मोबाइल आ ईयरफोन से दूरी बनावल जाउ। घर-परिवार के लोग आ संगी-साथी अउर पड़ोसी का सङे बइठ के गप-शप कइल जाउ। असली जिनगी के बोधो तबे होई, जब कान के फोन कान पर से उतरी।


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