मछरी
रामेश्वर सिंह काश्यप ताल के पानी में गोड़ लटका के कुंती ढेर देर से बइठल रहे। गोड़ के अंगुरिन में...
Read MorePosted by Editor | Apr 2, 2021 | पुस्तक चर्चा, भाषा, सतमेझरा, समीक्षा |
डॉ अर्जुन तिवारी न समझने की ये बातें हैं न समझाने कीजिंदगी उचटी हुई नींद है दीवाने की. फिराक...
Read Moreआशारानी लाल अबहिंए सोझा एतना न परछाई रेंगत रहीसन कि ना बुझाय कि कवना के ढेर निहारीं आ कवना के कम।...
Read More(कविता-अंक ”पाती“, सितम्बर-1993 से मार्च 2021 अंक में फेरु प्रकाशित) डॉ अशोक द्विवेदी आज के असहाय,...
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