उमेद
– संतोष कुमार पटेल जरल रोटी गरहन लागल चान बाकिर आस मरल ना कहियो त होई बिहान. राहू लागले ना रही हटबे करी आ भूख के रात कटबे करी. एही उमेद पर जिनिगी चलले. करेजा वाला जिएला डरपोक हाथ मलेला ओठ झुराला फाटेला जेठ के खेत नियर...
Read Moreभोजपुरी इलाका में एगो कहावत पहिले मशहूर रहे कि जम्हुआ के छुवला के डर नइखे, परिकला के बा. तब चिकित्सा सुविधा का अभाव में बहुते शिशू जनम का दू चार दिन का भितरे टिटनेस के शिकार हो जात रहलें. हँसुआ से नार कटात रहुवे आ अन्हार कूप...
Read More– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” रातिभर दुनु परानी सुति ना पउवींजा. करवट बदलत अउर एन्ने-ओन्ने के बाति करत कब बिहान हो गउए, पते ना चलुवे. सबेरे उठते मलिकाइन चाय बना के ले अउवी अउर कहुवी की जल्दी से तइयार होके आफिस चलि जाईं....
Read More– आशुतोष कुमार सिंह भोजपुरिया लोग धान के बिया जइसन होखेलन, जब ले उनका के एगो खेत से दोसर खेत में ना रोपल जाई, उनकर उपजाउपन ना बढ़ी (ई बात दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ावे वाला प्रमोद कुमार जी एगो मुलाकात के दौरान कहले...
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