भोजपुरियन के सुभाव जाने के कोशिश
Attempting to understand Bhojpuria
भोजपुरियन – भोजपुरी भाषी लोग जे दुनिया में कहीं के होखे, कहीं के बासिन्दा होखे – के सुभाव देख के एगो मजेदार निष्कर्ष निकलेला। एह लोग में गजब के दोहरापन मिलेला। एक तरफ त अपना संस्कृति के गौरव राखेला लोग आ दोसरा तरफ एगो गजबे के भाषाई विविधता। भोजपुरिया जतना जल्दी दोसर भाषा सीख लेलेंं ओकर उदाहरण दोसरा समाज में मुश्किल से मिली। जँहे जाला लोग तँहे के भाषा अपना लेला लोग। मारीशस गइल लोग त क्रिओल बना लीहल, सूरीनाम गइल त सूरीनामी।
आ एह भाषाई विविधता के समाहित कइला का चलते भोजपुरी का सोझा वर्तनी के समस्या विकराल रूप धारण कर के खड़ा बावे। अगर एगो मानक भोजपुरी वर्तनी बनावे चलल जाव त एह सुभाव आ विविधता के अध्ययन बहुते जरूरी रही।

भाषाई दोरुखी
भोजपुरियन के सबले खास बात होला कि घर का भीतर ई दोसर भाषा बोलेलें आ बाहर समाज में दोसर भाषा। आ ई दुनू में एके जइसन सहज भाव राखेलें।
निजी अपनापन : जब परिवार का भीतर, करीबी हीत-मीत का बीच रहत घरी, अपना गाँव-जवार के लोग का साथे रहत घरी भोजपुरी में बतियवला से केहू रोक ना पावे। काहे कि भोजपुरी में एह लोग के गहीर भावनात्मक लगाव रहेला। भोजपुरी में ई लोग अपना सहज स्वरूप में होला बेलगाम, बेधड़क। एही चलते कहल जाला कि भोजपुरी माटी के बोली हऽ।
बाहरी दुनिया के बीच : बाकिर भोजपुरिया जसहीं दोसरा भाषी समूह का बीच जालें, भा अपना सामाजिक व्यवहार में, शैक्षणिक वातावरण में, अपना अध्ययवासी वातावरण में एह लोग में गजब के परिवर्तन आ जाला। तब ई लोग हिन्दी भा अंगरेजी छोड़ कुछ ना बोले। काहे कि एह लोग के इहो मानना होला कि भोजपुरी गँवई आम लोगन के तथाकथित अश्लील लोगन के भाषा हवे। घर का भीतर भलहीं लंगटे रहसु बाहर त सज सँवर के रहहीं के पड़ी वाला अन्दाज में। दोसर कवनो भाषी समुदाय में एह तरह के दुविधा ना लउके। दू गो मैथिल मिलिहें त मैथिली में, बंगाली बंगला में, पंजाबी पंजाबी में, मलयाली मलयालम में, तेलुगू तेलुगू में, कन्नड़ी कन्नड़ में, तमिलियन तमिल में बतियावत मिल जइहें बाकिर बाहरी समाज का बीच दू गो भोजपुरिया मुश्किल से मिलिहें जे भोजपुरी में बतियावत होखसु।
आ एह सुभाव भा बेवहार के परिणति होला कि भोजपुरी लिखे पढ़े के आदत ना बन पावे। अतना बड़ भाषी समुदाय के आपन एगो दैनिक अखबार, एगो समाचार चैनल ना होखला का पीछे के कारण भोजपुरियन के इहे भाषाई दुविधा होला।
सांस्कृतिक गौरव बनाम संस्थागत अनदेखी
अपना सांस्कृतिक निशान का प्रति बेहद सचेत आ संवेदी होखला का बावजूद भोजपुरिया एकरा के संरचनात्मक बदलाव में ले आवे में हिचकिचालें। भोजपुरी के संस्था समिति सम्मेलनो के विज्ञप्ति भोजपुरी में ना होके अंगरेजी भा हिन्दी में होखल करेला। जबकि भाषाई प्रेम होखीत त विज्ञप्ति के मूल भोजपुरी में देत ओकरा साथे हिन्दी भा अंगरेजी अनुवाद आराम से दीहल जा सकेला। एह से समाचार पत्रन के जरुरतो पूरा हो जाई आ राउर सम्मानो बरकरार रहि जाई। उहो माने लगीहें कि एह संस्था/समिति/सम्मेलन के वास्तव में भोजपुरी के सम्मान बा। बाकिर हिन्दी भा अंगरेजी के विज्ञप्ति इहे देखावेला कि ई लोग अपना भाषा के हिकारत जोग बूझत बा।
बहुते लिखनिहार अइसन मिलेलें – आ एह लोग के स्वागत अभिनन्दन होखे के चाहीं – जे भोजपुरी में लीखल करेलें। अलग बाति बा कि एह लोग के हिन्दी साहित्य में कवनो जगह बनावल कठिन लागत होखो। बचपने से हिन्दी भा अंगरेजी माध्यम से मिले वाला शिक्षा एह लोग के एह लायक छोड़बे ना करे कि ई सही भोजपुरी बोले-लिखे-पढ़े में पारंगत हो सके। पत्र-पत्रिका-पुस्तकन के अभावो भोजपुरी लिखे-पढ़े के आदत ना बने देव। हँ बोलत घरी दिक्कत ना होखे। हिन्दी के बारह गो स्वर के सीमा, अंगरेजी के पाँच गो स्वर के सीमा का मुकाबले भोजपुरी के स्वर करीब डेढ़ दर्जन हो जाला। चूंकि हमार व्याकरण ज्ञान ना के बराबर बा एहसे एकरा के अउर व्याख्या नइखीं कर सकत।
लोकगीत आ लोकोक्तियन के सम्मान
छठ पूजा आजु पूरा दुनिया में होखे लागल बा आ हर जगहा छठी माई के भोजपुरी गीत सुने के मिलेला। भोजपुरिया अपना संस्कृति के संजोवे में कमजोर ना पड़सु बाकिर देखावे में जतावे में जरुरे कमजोर लउकेलें। भोजपुरियन के सामूहिक स्मृति आ अपना जड़ से जुड़ाव सचहूं सम्मानजोग होला बाकिर ओकरा के खुले के देखावे में आवे वाला संकोचो ओतने साँच होला।
भोजपुरी लिखनिहारन के सबले बड़ कमजोरी होला कि ऊ नवहियन के उत्साह ना बढ़ा के ओहनी के हतोत्साहित करे में आनन्द के अनुभव करेलें। दोसरा लिखनिहार के विश्लेषण, टिप्पणी कइल एह लोग के सुभावे में ना होखे। ई लोग अइसन कवनो माहौल बनावे के कोशिशे ना करसु जवना से भोजपुरी में नवही लेखन के बढ़ावा मिल सके। परिणाम इहे होला कि दलित साहित्य, पिछड़ा साहित्य, बाबाजी के साहित्य, आ बबुआन के साहित्य के तरह तरह के गुट बन गइल बा। संस्था समिति सम्मेलन के भरमार मिल जाला बाकिर सदस्य ना मिल पावसु। करीब हर संस्था समिति के एगो पालनहार धनपशु बाड़ें जे कवनो स्वतंत्र लेखन के बढ़ावा दीहल अपना हैसियत के चुनौती मान लेलें।
आप्रवासी भोजपुरिया
दुनिया भर में भोजपुरिया मिल जालें। कुछ लोग त पुरनका जमाना में मजदूरी करे खातिर ले आइल गइल रहलें। जइसे कि गिरमिटिहा – एग्रीमेंट का तहत – लोग। बाकिर ई लोग हर जगह अपना सांस्कृतिक परंपरा के संजो के रखले बा।मारीशसो में गंगा जी मिल जाली, छठ घाटो मिल जाला। अलग बाति बा कि जइसे हिन्दुस्तानी भोजपुरी में अंगरेजी आ अरबी फारसी के शब्द मिलेला वइसहीं मारीशस के भोजपुरी में फ्रेंच के शब्द। सूरीनामी भोजपुरियो हमनी के भोजपुरी से अलगे अंदाज के होला। त्रिनिडाड टोबैगो के भोजपुरी अलगे। आ विदेश के बात छोड़ीं अपने देश के अलग अलग इलाका के भोजपुरी अलग अलग मिल जाला। तीन कोस पर पानी बदले, पाँच कोस पर बोली। आरा, छपरा, बलिया के केन्द्रीय भोजपुरी, गोरखपुर, देवरिया, मोतिहारी, बनारस, गाजीपुर, जौनपुर वगैरह से बहुत कुछ अलगे हो जाले। वर्तनी के एकरुपता एहू चलते मुश्किल काम हो जाला। तबहियों कॉमन सिविल कोड का तरह हर समाज समुदाय के सही बात के समाहित कर के एगो सर्वमान्य मानक भोजपुरी वर्तनी बनावल मुश्किल काम ना होखी। बाकिर एकरा खातिर जइसन समर्पण स्थापित लिखनिहारन में होखे के चाहीं तवन देखे के ना मिले।
सरकारी संरक्षण के अभाव आ हिन्दी के विस्तारवादी आचरण
भोजपुरी के स्वाभाविक सम्मान ना मिलला का पीछे सबले बड़का कारण बा कि एह भाषा के सरकारी संरक्षण नइखे मिलत। हिन्दी के विस्तारवादी नीति का चलते उत्तर भारत के बहुते भाषा समाप्ति का कगार पर आ गइल बाड़ी सँ। भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता ना मिले एकरा खातिर भोजपुरी इलाका से आवे वाला हिन्दी साहित्यकार कवनो अवसर ना छोड़सु।
आप्रवासी भोजपुरियन का साथही देश के अलग अलग व्यावसायिक आ औद्योगिक केन्द्रन पर प्रवास करे वाला भोजपुरिया चाहियो के भोजपुरी के स्थापित करे के काम ना कर पावसु। दिन भर के मेहनत मजूरी कइला का बाद उनुका भोजपुरी गीत गवनई के आदम रुप आराम दे देला आ ऊ एही से सतुष्ट हो जालें। जबले भोजपुरी के स्थापित लिखनिहार, संगीतकार, कवि, गायक, अभिनेता अपना भाषा का प्रति संवेनशील ना होखिहें तबले ई समस्या खतम नइखे होखे वाला। लट्ठधारी लोग भोजपुरी के जवनो अस्तित्व बाचल बा ओकरो के खतम करे में तुलल रहेलें। अपना माई भाषा के छिनार कहे वाला कवनो दोसरा भाषा में ना मिलिहें बाकिर भोजपुरी में ऊ बड़का नाम बन के बइठल बाड़ें।
भोजपुरियन के बहुभाषी सुभाव
भोजपुरियन के खासियत हवे कि ऊ दोसर तेसर भाषा सीखे में देर ना करसु। दोसरा भाषा के जतना सहजता से पचा जालें ओतना सहज कवनो दोसर भाषाई समाज में देखे के ना मिले। ई ताकतो तब कमजोरी बन जाला जब एह चलते मानक भोजपुरी वर्तनी के सवाल अनदेखल रह जाला। दोसरा भाषा के कठिन भा दुरुह शब्दन के भोजपुरिया बहुते सहजता से भोजपुरिया लेलें। बोले में त एहसे आसानी हो जाला बाकिर लिखे में दिक्कत।
जरुरत बा सक्रियता के
भोजपुरियन के सुभाव देखला समुझला का बाद अब एह दिशाईं सक्रिय होखला के जरुरत बा। आ भाषाई मानक के बहुते दुरुह ना बना के जतना सहज हो सके ओतना सहज रुप तय करे के पड़ी। जब कवनो शब्द के कई गो रुप मिले त ओहमें जे जवन सबले सहज होखे – संयु्क्ताक्षर ना होखे, मात्रा स्वर के कमी होखे, बोले लिखे पढ़े में दू तरह के अर्थ ना बतावे – ओकरे के अपनवला के जरुरत बा। अंगना के अङना, माँग के माङ, देश के देस, भाषा के भासा, जइसन उदाहरण हमरा समुझ से महटियावे के चाहीं। हँस आ हंस के फरक बहुते महीन होला बाकिर अइसनका फरक से सावधान रहे के पड़ी। शंकर के संकर लिखल गलत माने बता दी। एहसे हर श के स आ हर ष के ख बनावे से बचे के चाही।
आखिर में फेर एगो सफाई
हम ना भाषाविद हईं ना व्याकरणाचार्य। हम भोजपुरी के एगो साधारण नेही हँई जे चाहेला कि भोजपुरी के लोकप्रियता, स्वीकार्यता बढ़ो। भोजपुरी में रोजी रोजगार के संभावना बनो। अब रउरा सभे के रायो जानल ओतने जरुरी बा। बेझिझक एह पर आपन राय लिखीं। जतना बेसी चरचा होखी भोजपुरी के ओतने भलाई होखी।
एह तरह के चरचा हम लगातार रेघरियावत रहे के कोशिश करब बाकिर रउरो सभे के लागे के होखी एह काम में। अपना मंच पर, अपना समाज/समिति/सम्मेलन में, अपना पत्रिका मे, अपना सोशल साइट पर । अगर ऱउरा सभे अपना अपना मंच के जानकारी साझा करे के सोचीं त अंजोरिया एगो स्वतंत्र मंच हो सकेला। हम ना त तीन में हईं ना तेरह में। लंगड़ी गईया के अलगे बथान बाकिर सभका के अपना मँड़ई मे जगह देबे ला तइयार। रउरा महल में हमरा ला जगह होखे भा ना, हमरा मँड़ई में राउर हमेशा स्वागत रही।


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