साल २०२५ में कहल जाई : एगो लोक भाषा होखत रहुवे
बाजार के दबाव में तिल-तिल कर के मरत भोजपुरी भाषा के दुर्दशा लेके हम कुछ समय पहिले एगो उपन्यास लिखले रहीं “लोक कवि अब गाते नहीं.” इंडिया टुडे में एकर समीक्षा लिखत मशहूर भाषाविद् अरविंद कुमार तारीफ के पुल बान्हत एगो...
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