फागुनः दू गो गीत
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल!...
Read MorePosted by Editor | Mar 29, 2012 | कविता, पुस्तक चर्चा, साहित्य |
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल!...
Read MorePosted by Editor | Mar 29, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
अतिथि संपादक के कलम से… भारत के सामाजिक व्यवस्था एगो अइसन अत्याधुनिक व्यवस्था बा जेकरा चलते आजो इ देश के वंचित समाज घोर कष्ट में जीवन जीये खातिर बाध्य बा. जाति व्यवस्था, जेकरा ऊपर धरम के मोहर लागल बा, उ ‘कैंसर’ जइसन भयानक...
Read MorePosted by Editor | Mar 8, 2012 | पुस्तक चर्चा |
भारत के समाचार पत्र निबंधक के कार्यालय से मिलल जानकारी का हिसाब से देश में भोजपुरी के तैंतीस गो प्रकाशन पंजीकृत बाड़ी सँ. भोजपुरी प्रकाशन के एगो सामूहिक मंच दिलावे खातिर सोचत बानी कि एह सगरी पत्र पत्रिका के प्रकाशक, संपादक आ...
Read MorePosted by Editor | Feb 27, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
‘ हिन्दी में सम्पादकीय की परम्परा खत्म हो रही है. साहित्य और पत्रकारिता एक दूसरे से विछिन्न हो रहे हैं, वहीं अखबार दैनिक साहित्य है जो जितना कालातीत होता है उतना ही तात्कालिक भी होता है. अखबार तात्कालिकता का आईना है.’ ई कहना रहे...
Read MorePosted by Editor | Feb 22, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 19वी प्रस्तुति) – अनन्त प्रसाद ‘रामभरोसे’ भोजपुरिहा कतनो परेशानी में रहिहन, मोका पावते केहू से हँसी-मजाक करे से बाज ना अइहन. केहू के रिगावल आ रिगला पर लिहाड़ी लिहल, एने का लोगन...
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