श्रेणी: साहित्य

वसंत कहीं नइखे भुलाइल

– पाण्डेय हरिराम जाड़ा आहिस्ता से मौसम के गाल चूमलसि त मौसम का रग में गर्मी दउड़ि गइल…. लोग कहल वसंत आ गइल. फगुआ आ गइल. आ आजु साँचहू के फगुआ ह. बाकिर कहवाँ… काल्हु सँझिया एगो पड़ोसिन बतवली कि सड़कन पर रौनक नइखे....

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फाग गीत

– रामरक्षा मिश्र विमल लागेला रस में बोथाइल परनवा ढरकावे घइली पिरितिया के फाग रे. धरती लुटावेली अँजुरी से सोनवा बरिसावे अमिरित गगनवा से चनवा इठलाले पाके अँजोरिया जवानी गावेला पात-पात प्रीत के बिहाग रे. पियरी पहिरि झूमे सरसो...

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आइल होली आइल रे

– ओ.पी .अमृतांशु बरसे रंगवा हुलसे मनवा , नील गगनवा रंगाइल ! महँगिया खूब ईठलाइल , आइल होली आइल रे !! मस्त फगुनवा मस्ती के दिनवा , झूमेला गेठ जोडिके सरकारवा, भइल करोडो हॉय  रे घोटाला सउँसे खजाना लूटाइल ! महँगिया खूब ईठलाइल...

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चिल्लर काका

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” जाड़ा के दिन रहे. सूरूज भगवान बरीआई से उगले के कोसिस करत रहने. कोसिस ए से की उगले की बादो एइसने लागे की अब उग रहल बाने. लगभग दिन के 10 बजि गइल रहे तब्बो घाम में कवनो ना गर्मी रहे ना तेजी....

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