पलायन
– संतोष कुमार पटेल बाढ़, सुखाढ़ आ रोटी अजीब रिश्ता बा इनके जवन खरका देलख खरई खरई जिये के विश्वास साथे रहे के आस धकेल देलस दउरत रेल के डिब्बा में जहवां न बइठे क जगहे न साँस लेवे के साँस ऊँघत जागत दू दू रात के आँखिन में काटत...
Read More– प्रभाकर पाण्डेय ‘गोपालपुरिया’ नून-तेल-भात कबो, कबो दलिपिठवा, कबो-कबो खाईं हम भुँजा अउरी मिठवा, कबो लिट्टी-चोखा त कबो रोटी-चटनी, कई-कई राति हम बिना खइले कटनी. कबो मिलि जाव एक मुठी सतुआ, कबो-कबो खिचड़ी खिया दे...
Read More– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया” छोट रहनी तS कई बेर केहू-केहू कहि देत रहल कि ए बाबू अवतारी हउअS का? एकदिन रहाइल ना अउरी हम पूरा गाँव-गिराँव, हित-नात सबके बोलवनि अउरी कहनी की रउआँ सभे जानल चाहत बानी न की हम अवतारी हईं की का...
Read More– संतोष कुमार पटेल अब सीता सावित्री लक्ष्मी पार्वती जइसन नाम आउटडेटेड हो रहल बा काहे की अब लोग अपना आंख के पानी अपने धो रहल बा. लाज ओइसही बिलाइल जाता जईसे गरम तावा पर पानी के एगो बूंद रेगिस्तान में घडी भर के वरखा अब आँखिन...
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