नीक-जबून- 4
डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी चले दीं, प्रयोग बहे दीं धार काल्हु “ये दिल माँगे मोर” पर बहस होत रहे. हम कहलीं कि भाई ‘मोर’ का जगहा ‘और’ कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना. फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग. हर भाषा में लिखे-पढ़ेवाला...
Read Moreडॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी चले दीं, प्रयोग बहे दीं धार काल्हु “ये दिल माँगे मोर” पर बहस होत रहे. हम कहलीं कि भाई ‘मोर’ का जगहा ‘और’ कहलो पर त कुछ बिगड़ी ना. फेर काहें एकर ओकालत करतारे लोग. हर भाषा में लिखे-पढ़ेवाला...
Read More(भोजपुरी कहानी) – सुधीर श्रीवास्तव ‘नीरज’ राति अबहिन दुइयो घरी नाहीं बीतल होई बाकिर बरखा आ अन्हरिया क मारे अधराति के लखां सन्नाटा पसरि गइल रहे चारू ओर. अषाढ के बादर पूरा दल बल के साथे आ के डटि गईल रहे… आ...
Read More(ललित-व्यंग) – डा0 अशोक द्विवेदी आदमी आखिर आदमी हs — अपना मूल सोभाव आ प्रवृत्तियन से जुड़ल-बन्हाइल। मोह-ममता के लस्का आ कुछ कुछ आदत से लचार। ओकर परम ललसा ई हवे कि ऊ तरक्की करो आ सुख से रहो ! ई सुखवो गजब क चीझु ह s।...
Read Moreमान बढ़ाईं जा माटी के रामरक्षा मिश्र विमल दुअरा अंगना कहिया छिटकी मधुर किरिनिया भोर के कहिया पन्ना पलटल जाई भारत माँ के लोर के ? तमिल तेलगू बङला हिन्दी सब ह भारत के भाषा अपना जगह सभे कंचन बा एको ना बाटे ...
Read Moreडॉ. रामरक्षा मिश्र विमल के डायरी दीया-दियरी के दिन बहुरल तीन-चार दिन पहिले कपड़ा-ओपड़ा कीने खातिर निकलल रहीं जा. प्लेटफॉर्म प चढ़ते जवन लउकल, ओसे त चका गइलीं हम. जहाँ एक दिन पहिलहूँ खोजला पर पिछला जनम के दिया-दियरी मिलेले आ ऊहो...
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