गज़ल
– मिथिलेश गहमरी जरूर चाँदनी बिहँसी सुतार होखे दीं, उदास चान के गरहन से पार होखे दीं. बन्हाई काँहे ना जिनगी क पीर मूट्ठी में, हिया के पीर त अउरी सयार होखे दीं. इहे बा साँच कि, ओहारो बेच के खइहन, हुजूर, डोलीके उनके कहाँर...
Read More– डा॰ कमलेश राय हम अइना हर आँगन क हर चेहरा के रखवार हईं राख सहेज त एगो हम, तोरऽ त कई हजार हईं. हिय में सनेह से राखी लां दुख के पीड़ा सुख के उछाह निरखी ला रोज थिर रहि के, जिनिगी के सगरी धूप छाँह. छन में अधरन के मीठ हँसी, खन...
Read More– शिवजी पाण्डेय “रसराज” हाथ जोरि करतानी बिनति तहार, मईया शारदा. सुनी लिहितू हमरी पुकार, मईया शारदा.. गरे कुंड हार शोभे, श्वेत रंग सारी, नीर क्षीर जाँचे वाला हंस बा सवारी, बीनवा बजाई के जगइतू संसार, मईया शारदा....
Read More“भोजपुरी दिशाबोध के वैचारिक साहित्यिक पत्रिका “पाती” एगो अइसन रचनात्मक मंच ह जवन भोजपुरी भाषा साहित्य के एगो नया पहिचान दिहलसि. एकरा रचनात्मक आंदोलन से जुड़ के अनेके लेखक राष्ट्रीय स्तर पर आपन पहचान...
Read More– केशव मोहन पाण्डेय 1. गीत महुआ मन महँकावे, पपीहा गीत सुनावे, भौंरा रोजो आवे लागल अंगनवा में। कवन टोना कइलू अपना नयनवा से।। पुरुवा गावे लाचारी, चिहुके अमवा के बारी, बेरा बढ़-बढ़ के बोले, मन एने-ओने डोले, सिहरे सगरो सिवनवा...
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