टैग: भोजपुरी कविता

आईं आपन छान्हि छवाईं

– डा. कुमार नवनीत काठ करेजी भईल समईया पल पल बदलत दाव, बिछिलायीं जनि, धरीं थहा के आपन एकहक पाँव। सभ धवते बा, आप न धाईं सगरी सपना बेंचि न आईं मोल न कवनो मोल बिकाला, जहवाँ रहीं इहे सरियाईं आईं आपन छान्हि छवाईं तेजि महलिया...

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जयकान्त सिंह के तीन गो कविता – नया आ पुरान

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ जेठ भाई के निहोरा करऽ जन अनेत नेत, बबुआ सुधारऽ सुनऽ, तूँही ना ई कहऽ काहे होला रोजे रगड़ा । आपन कमालऽ खालऽ, एनहूँ बा उहे हालऽ आर ना डरेड़ फेर, काहे ला ई झगड़ा ।। चूल्हे नू बँटाला कहीं,...

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झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल झीमी-झीमी बूनी बरिसावेले बदरिया लागेला नीक ना । हँसे सगरी बधरिया लागेला नीक ना । सरग बहावेला पिरितिया के नदिया छींटे असमनवा से चनवा हरदिया धरती पहिरि लिहली हरियर चुनरिया लागेला नीक ना । नील रंग के...

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खोंच के दोहा

– मिर्जा खोंच आपन बड़ाई हर घरी, हरदम बड़का बोल तब जाके ए दुनिया में लागी तोहर मोल. रातो दिन पढ़ते रहल, बाकिर भइल ना पास भइल पैरवी तब जाके, जागल ओकर भाग. लुट के इहवाँ छुट बा, लूट सके त लूट तब जाके भगवन के, मार तनी सैलूट....

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सहर भइल सुरसा

– डॉ. गोरख मस्ताना सहर भइल सुरसा निगल रहल गाँव के चिमनी चबाये लागल निमिया के छाँव के नगर नगर नेहिया के दियरी टेमाइल नफ़रत के रोग गाँव गाँव में समाइल गाँवो में भईयारी बाँच गइल नाँव के सहर भइल सुरसा निगल रहल गाँव के. गँऊआ के...

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