गिरावट
– संतोष कुमार पटेल जब आदमी काठ-पत्थर हो जाला भाव से विचार से हियाव से त ओकरा मुंह के पानी उतर जाला जइसे मुरझा जाला फूल सेरा जाला सूरज दगिया जाला चान राहू के कटला पर डँसला पर जइसे कटेला घटेला चान ओइसहीं आदमी के जिनगी में...
Read MorePosted by Editor | Jul 13, 2010 | भोजपुरिया लाल, सरोकार |
– आशुतोष कुमार सिंह सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोर प्रान बसे हिम-खोह रे बटोहिया एक द्वार घेरे राम हिम-कोतवलवा से, तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया. ई गीत के सुनते मन में एगो गजब के आनंद के अनुभूति होखेला. भोजपुरी...
Read More– अभयकृष्ण त्रिपाठी बढ़िया रहीत दुनिया में अन्हरिये बनल रहीत करिया चेहरा दुनिया से दरकिनार रहीत. याद आवेला जब सारा जग उजियार रहे, सोन चिरईया के नाम जग में बरियार रहे, मुँह में मिश्री आँखिन में आदर भरमार रहे, स्वर्ग से...
Read More– आशुतोष कुमार सिंह पिछला रात हम नीमन से सुत ना पइनी. अंघीए ना लागल. घर से लेके दफ्तर तक के टेंशन हमरा नींद में बाधा उत्पन्न क देले रहे. रात में जब हमरा नींद ना आवत रहे तब हम ई सोचत रहीं कि ऊ दिन केतना नीमन रहे, जब चांद के...
Read More– डा॰ जनार्दन राय नीनि आइल निमन ह. जेकरा आँखि से इहां का हटि जाइला ओकर खाइल-पियल, उठल-बइठल, चलल-फिरल, मउज-मस्ती, हंसी-मजाक कुल्हि बिला जाला. अइसन जनाला कि किछु हेरा गइल बा, ओके खोजे में अदीमी रात-दिन एक कइले रहेला. निकहा...
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