Tag: पाती

माँगि आ कोखि

– रामदेव शुक्ल ‘अकाट गरीबी में जाँगर फटकत जनम बिता देबू कि तनिएसा मन बदलि के अमीर हो जइबू? सोचि समुझि ल, अपने मालिक से बतिया लऽ, हमके बिहने बता दीहऽ।’ कहि के मौसी चलि गइली। कुसुम लगली अपने मन में बाति के मथे। मौसी कहतियॉ...

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दइब टेढ़ भइले करमवो बा फूटल : गजल

– रामयश अविकल चलीं ई सबुर के बन्हल-बान्ह टूटल कमाये बदे आज घर-गाँव छूटल। मिलल मार गारी, मजूरी का बदला सरेआम अब आबरू जाय लूटल। भवन तीन-महला शहर में बा उनकर हमन के त झाँझर पलनियो ले टूटल। इहाँ दाल-रोटी चलल बाटे मुस्किल दइब...

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भोजपुरी-वर्तनी के आधार

– स्व. आचार्य विश्वनाथ सिंह (ई दस्तावेजी आलेख एह खातिर दिहल जाता कि भोजपुरी लिखे-पढे़े में लोगन के सहायक-होखो) भोजपुरी भाषा में उच्च कोटि के साहित्य-रचने करे खातिर ना, ओकर सामान्य रूप से पठन-पाठन करे खातिर आ ओकरा के कलम के...

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लोकजीवन के ‘बढ़नी’ आ ‘बढ़ावन’

– डा॰ अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा, आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार सब के व्यक्त करे क ‘टोन’ आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं, उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका गाँव आरा (बिहार) से आइल...

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