Tag: बतकुच्चन

घूर का घुरची में घुरचियाइल (बतकुच्चन – 193)

जय हो बाबा लस्टमानंद के! पिछला अतवार के घूर के चरचा में अइसन टीप दिहलन कि सोचल धरा गइल आ हम घूर का घुरची में घुरचिया के रह गइनी. सोचे लगनी त लागल कि आखिर हम बतकुच्चन में करेनी का, घुरबिनिया छोड़ के. बाकिर घूर आखिर कइसे अतना...

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कमान आ कमीना का बहाने (बतकुच्चन – 192)

भासा संस्कार से बनेला आ संस्कार भासा से. भासा संस्कार देखावेले आ संस्कार भासा के इस्तेमाल के कमान सम्हारेले. कमान सम्हारे खातिर कई बेर कमानी चढ़ावे पड़ेला आ कई बेर कमाने से काम चल जाला. एह कमाने आ कमाई वाला कमाने के कवनो संबंध...

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गउँवा गउँईं त गईंया भेंटइले (बतकुच्चन – 191)

भोजपुरी के खासियत ह कि एकरा में नया शब्द गढ़े के अपार बेंवत मौजूद बा आ इहे एकर कमजोरियो साबित हो जाले कई बेर. हिन्दी के विद्वान लोग जब भोजपुरी लिखे चलेला त अकसरहाँ ओह लोग के संस्कृतनिष्ठ हिन्दी आ व्याकरण बोध हावी रहेला आ फरक...

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लीनक्स आ विंडोज का बहाने भोजपुरी के चरचा (बतकुच्चन – 190)

कंप्यूटर के दुनिया में दू तरह के साफ्टवेयर होला. एगो त प्रोप्राइटरी, जवना के मलिकान कुछ खास लोग का लगे होला आ उहे लोग तय कर सकेला कि एहमें का रही, कइसे रही, का करी वगैरह. दोसरका होला ओपन सोर्स, जवना के मलिकान केहू का लगे ना...

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किराया आ भाड़ा (बतकुच्चन – 189)

कहे खातिर त तुलसिए बाबा कह गइल बानी कि ठठा के हँसल आ गाल फुलावल एके साथे ना कइल जा सके. बाकिर आजु के जमाना में एह तरह के नमूना आए दिन देखे के मिले लागल बा. संगही रहि के एक दोसरा से घात करे के चलन बढ़ल जात बा. नया तरीका, नया...

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