ई सब रोग गरीबी के
– डॉ. कमल किशोर सिंह उत्तर टोला बर तर, बईठल चबुतर पर, धनिया ढील हेरवावत रहे, सुबुकत सब सुनावत रहे – कतना दुःख सुनाईं बहिनी ई ना कभी ओराला, आ धमकेला दोसर झट से जसहीं एगो जाला. भादो में भोला के कसहूँ गोडवा गइल छिलाय....
Read More– डॉ. कमल किशोर सिंह उत्तर टोला बर तर, बईठल चबुतर पर, धनिया ढील हेरवावत रहे, सुबुकत सब सुनावत रहे – कतना दुःख सुनाईं बहिनी ई ना कभी ओराला, आ धमकेला दोसर झट से जसहीं एगो जाला. भादो में भोला के कसहूँ गोडवा गइल छिलाय....
Read More(दयानंद पाण्डेय के लिखल आ प्रकाशित हिन्दी उपन्यास के भोजपुरी अनुवाद) सातवाँ कड़ी में रउरा पढ़ले रहीं...
Read Moreआजु पता ना काहे मन अँउजाइल बा. लागत बा कि कंठ में कुछ अटकल बा अँउजार जइसन. आ कंठ का भीतर कुछ अटकल होखे त जान पर आफत बनि जाला कबो-कबो. अलगा बाति बा कि कंठ का बाहर लटकल कंठहार औरतन के सुंदरता बढ़ा देला. कंठ गवनई के सुरो के कहल...
Read More– ओ.पी .अमृतांशु जीतल मंगरुआ बो मुखिया चुनाव में मचल बा हाय खलबली, देखऽ गली -गली. छाका छोड़ाई दिहलस एमे. बीए पास के मुखिया जी खुरुपी ले के चलीं दिहलें घास के निपट-अनाड़ी भारी उठल बीया गावँ में मचल बा हाय खलबली, देखऽ...
Read MorePosted by Editor | मई 2, 2011 | पुस्तक चर्चा |
समीक्ष्य कृति : भोजपुरी जिंदगी (त्रैमासिक पत्रिका) प्रकाशन अवधि : अक्टूबर-दिसंबर, 2010 वर्ष : 1 अंक : 1 सहयोग : 25 रुपए / सालाना : 100 रुपए प्रधान संपादक : डॉ. गोरख प्रसाद मस्ताना संपादक : संतोष कुमार प्रकाशन संपर्क : आर जेड...
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