Category: साहित्य

चैन लगे बेचैन (उलटन)

– अशोक द्विवेदी ना जुड़वावे नीर जुड़-छँहियो में, बहुत उमस लागे. चैन लगे बेचैन, देश में बरिसत रस नीरस लागे! बुधि, बल, बेंवत, चाकर… पद, सुख, सुविधा, धन, पदवी के लाज, लजाले खुदे देखि निरलज्ज करम हमनी के बुढ़वा भइल...

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माँगि आ कोखि

– रामदेव शुक्ल ‘अकाट गरीबी में जाँगर फटकत जनम बिता देबू कि तनिएसा मन बदलि के अमीर हो जइबू? सोचि समुझि ल, अपने मालिक से बतिया लऽ, हमके बिहने बता दीहऽ।’ कहि के मौसी चलि गइली। कुसुम लगली अपने मन में बाति के मथे। मौसी कहतियॉ...

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चइता

– देवेंद्र आर्य आइ गइल चइत महिनवा हो रामा पिंहके परनवा। चिठिया लिखवलीं , सनेसवा पढवलीं आधी आधी रतिया ले रहिया रखवलीं नाहीं अइलें हमरो सजनवां हो रामा पिंहके परनवा। बेलिया फुलाले , चमेलिया फुलाले केतनो जतन करीं बात छितराले...

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दू गो गीत

– अक्षय कुमार पाण्डेय (1) बसन्त चमचम चमके लागल पीतर सोना जइसन भाई – समझऽ अब बसन्त आइल हऽ। पुरुवा से पछया झगरत बा दुपहर साँझ फजीरे, पाथर के रसरी रगरत बा हँसि-हँसि धीरे-धीरे, उतर गइल पानी इनार के उकचे लागल काई, समझऽ अब...

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अपना मूल के जनला समझला के माने

– डा. अशोक द्विवेदी गँवई लोक में पलल-बढ़ल मनई, अगर तनिको संवेदनशील होई आ हृदय-संबाद के मरम बूझे वाला होई, त अपना लोक के स्वर का नेह-नाता आ हिरऊ -भाव के समझ लेई. आज काकी का मुँहें एगो जानल-सुनल पुरान गीत सुनत खा हम एगो दोसरे...

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