Category: साहित्य

भाग गइल भूत

– डॉ॰ उमेशजी ओझा छुटी के दिन रहे. हम सुरेश का घरे छुट्टी मनावे गइनी त हमरा के देखते सुरेश कहलन, ‘अहो भाग्य कि रउआ पधरनी हमरा दुआर प.’ ‘अरे का बोलऽतानी. बहुत पहिले से सोचले रही कि अतवार का दिने रउआ घरे के...

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बनचरी (भोजपुरी के कालजयी उपन्यास के पँचवी कड़ी)

– डा॰ अशोक द्विवेदी स्नान-पूजा का बाद जब कुन्ती अनमनाइल मन से कुछ सोचत रहली बेटा भीम का सँगे बाहर एगो फेंड़ का नीचे हँसी-ठहाका में रहलन स. हिडिमा के पास आवत देखि कुन्ती पुछली – – ‘बेटी ए स्थान के आसपास, कहीं...

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गुलजारी लाल के जूता

– देवेन्द्र कुमार गुलजारी लाल जी आपन संघतिया मनमौजी के संगे साप्ताहिक बाजार मंगला हाट में हफ्ता भर के जरूरी सामान के खरीदारी करे खातिर गइल रहलें. दूनो संघतिया बाजार में घूमत-फिरत आपन जरूरत के मुताबिक सर-सामान खरीदत रहलें....

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गौरैया

– केशव मोहन पाण्डेय जइसे दूध-दही ढोवे सबके सेहत के चिंता करे वाला गाँव के ग्वालिन हऽ गौरैया एक-एक फूल के चिन्हें वाला मालिन हऽ। अँचरा के खोंइछा ह विदाई के बयना हऽ अधर के मुस्कान ह लोर भरल नैना हऽ। चूडि़हारिन जस सबके घर के...

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बनचरी (चउथी कड़ी)

– डा॰ अशोक द्विवेदी एगो विशाल बटवृक्ष का नीचे पत्थर शिला खण्ड का टुकड़न से सजाइ के एगो चबूतरा बनावल रहे. वृक्ष का एकोर ओइसने पत्थर के चापट टुकड़न के सरियाइ के गोलाकार ऊँच देवाल लेखा बनावल रहे जवना का ऊपर से वटवृक्ष क डाढ़ि...

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