Category: सतमेझरा

चला भउजी तुहीं बोला – भारत माता की जय !

भउजी हो ! के ह? केकर भउजी? कइसन भउजी? केंवड़िया खोलबू त देखिए लेबू. जानत बानी कि खिसियाइल बाड़ू. ढेर दिन पर आइल बानी. कनिया आवे के परमिशन दे दिहलसि? अरे ना भउजी, उनकर दोष नइखे. एह घरी हमहीं असकतायाए लागल बानी. नयका सब सुनत नइखन...

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आआपिया के पापी कानून मंत्री

– डा0 अशोक द्विवेदी कहल गइल बा कि मूरख उलटेला तबो मुरुखे रहेला बाकि साक्षर उलटि के राक्षस हो जाला, “साक्षरा विपरीताश्चेत राक्षसा एव केवलम्..” ! एही तरे कानून क जानकार जदि कानून का उल्टा सोचे आ निगेटिव करे शुरू...

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पत्रकारिता के चोला भा बुरका

बिहार विधानसभा के चुनाव अबहीं टटका मुद्दा बा बाकिर घूमा फिरा के ई मुद्दा हमेशा बनल रहेला कि पत्रकार के राय कवना गोल के बा. कहे खातिर त सगरी पत्रकार हमेशा तटस्थता आ ईमानदारी के चोला भा बुरका पहिरले रहेलें बाकिर तनिका धियान दे दीं...

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बात पर बात (बतकुच्चन – 195)

सरकार बदलले एक साल बीतल बा आ देश मे बतकही के दौर जारी बा. ई बतकही कब बतकही में बदल जाई केहु ना बता सके. बातचीत कब बाताबाती हो जात बा बुझाते नइखे. सरकार कुछ बोलत ना रहुवे त शिकायत रहुवे कि सरकारो के मालूम बा कि ओकरा लगे बतावे...

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लोकजीवन के “बढ़नी”

– डाॅ. अशोक द्विवेदी ‘लोक’ के बतिये निराली बा. आदर-निरादर, उपेक्षा-तिरस्कार के व्यक्त करे क टोन आ तरीका अलगा बा. हम काल्हु अपना एगो मित्र किहाँ गइल रहलीं. उहाँ दुइये दिन पहिले उनकर माई उनका उनका गाँव आरा...

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