तुहूँ आवऽ तुहूँ आवऽ उनुको के लेले आवऽ
- टीम अंजोरिया

तुहूँ आवऽ तुहूँ आवऽ उनुको के लेले आवऽ

 

दलबदल, दू-तिहाई बहुमत, संविधान में बदलाव आ परिसीमन : लोकतंत्र खातिर संभावना कि संकट?

एह घरी जवन कुछ देश के राजनीति में चल रहल बा तवन अभूतपूर्व बा। पहिले दल-बदल होखत रहुवे अब दल-दखल हो रहल बा। एक लाख पूत सवा लाख नाती ओकरा घरे दिया ना बाती। जे लोग कुछ महीना पहिले धिरावत रहल कि देखीं चार मई का बाद तोहर कवन बाप आ के तोहरा के बचावत बा ऊ बिला गइलें। केहू साथे नइखे रहि गइल। तृणमूल के श्राद्ध का बाद अब आपरेशन लाल टोपी ( मशहूर पत्रकार प्रदीप सिंह के गढ़ल नाम।) वगैरह तरह तरह के आपरेशन चल रहल बा। आ सबले खास ई कि सर्जरी कवनो प्रशिक्षित सर्जन नइखे करत, झोला छापन के ई जिम्मा सँउप दिआइल बा। मरीज बाच जाई त जय जय, निपट जाई त ठेंगा से!

Image by chatGPT for this post on large scale defections

पहिले इक्का दुक्का जन प्रतिनिधि आया राम गया राम का भूमिका में आवत रहलन। बाद में एकरा के कुछ लोग धंधा बना लीहल आ दाम ले के दिल देबे के काम करे लागल लोग। सबले खराब उदाहरण देखे के मिलल रहुवे नरसिहराव का सरकार का दौरान जब रुपिया ले के सांसदन के मतदान करे के बात जगजाहिर हो गइल रहुवे। कानूनो मनलसि कि ई लोग अपराध कइले बा बाकिर चूंकि काम संसद का भीतर भइल एहसे बाहर के कवनो संस्था एह पर कार्रवाई ना कर सके। आ संसद से अइसन उमेद ना तब केहू का रहुवे ना अब बा।

इटालियन माफियन का बीच आपसी समझदारी से एगो ओमर्टा सिस्टम बनावल गइल। एहमें कवनो माफिया दोसरा माफिया से अपने जइसे निपट लेव, बाकिर पुलिस के भा बाहरी ताकतन के सहारा ना ली। केहू का खिलाफ मुखबिरी ना करी आ अपना दुश्मन से अपने आ अपना अंदाज में निपटल करी। भारत के राजनीतिक दलन में इहे सिद्धान्त मानल जाला आ एही चलते कवनो दमदार राजनीतिक नेता कबहियोा कानून का फंदा में ना आइल चाहे ऊ अमेठी वाला काण्ड होखे, चारा चोरी के, भा टोंटी चोरी के। आ अब एही में एगो नया मामिला जुड़ गइल बा। अयोध्याधाम के भगवान श्रीराम मन्दिर के दान के चोरी वाला। तय मानीं कि छोटका मोटका मोहरा भलहीं धरा जा सँ, बड़का अपराधी आसानी से चंपत हो जइहें। अब एह चम्पत के कवनो आदमी के नाम से मत जोड़ लीहल जाव।

आईं अब दल-बदल से बढ़ के दल-दखल का मुद्दा पर

पहिले जब खुचरा में दल बदल होखत रहुवे। बाद में ई थोक में होखे लागल। दल के एकतिहाई सदस्य दल छोड़ के आपन नया दल बना सकत रहलें आ बना के सत्ताधारी दल का साथे मिल के काम करे लागत रहलें। बाद में एकरा में सुधार कर के व्यवस्था बना दीहल गइल कि कम से कम दू तिहाई सदस्य अलग हो सकेलें आ अलग भइला का बादो आपन गुट ना बना सकसु, कवनो ना कवनो दोसरा दल में शामिल होखे के पड़ी। एह संशोधन से कुछ दिन ले समस्या पर काबू बनल रहल।

बाकिर महाराष्ट्र मे पहिला बेर अइसन भइल कि दू तिहाई से बेसी विधायक अलगा होके अपने के असली दल होखे के दावा ठोक दिहलें। विधानसभा के स्पीकर आ चुनाव आयोग एह दल-दखल के मान्यता दे दिहलें। अदालत में अबहीं एह मामिला पर अन्तिम फैसला आइल बाकी बा। बाकिर एह घटना से बाघ का मुँहे खून लाग गइल। शिवसेना का बाद दोसर निशाना बनल शरद पवार के राकांपा। एह दुनू दल के न‌ाम, चुनाव चिह्न, झंडा सब कुछ बागी ले गइलें।

चार मई का बाद जवन तृणमूल का साथे भइल तवन एगो अलगे उदाहरण बन गइल। तृणमूल के विधायक आ सांसद अलगा हो के एगो पंजीकृत राजनीतिक दल में शामिल हो गइलें। नेशनल सिटिजन पार्टी आफ ईण्डिया के नाम वाला एह दल का लगे एकहूं विधायक भा सांसद कबो ना रहलें। बाकिर एकही झटका में ई दल संसद में देश के पाँचवा सबले बड़ दल बन गइल।

बरबादी का पीछे एक नाम

तृणमूल के एह दुर्गति का पीछे अगर एगो नाम लीहल जाव त ऊ अभिषेक बनर्जी के होखी। जइसे कि शिवसेना के दुर्गति का पीछे संजय राउत रहलन। शरद पवार के दुर्दशा का पीछे दोसर केहू ना शरद पवार अपनहीं रहलन जे अपना बेटी के आगा बढ़ावे खातिर अपना भतीजा के अलगा करे के सोचलन। आ अगर एक तरह से देखल जाव त अगिला नाम कांग्रेस के होखी आ एकरा पीछे एगो नाम रही सोनिया गाँधी के। अपना पुत्र मोह का चलते ऊ अपना बेटी के राजनीति से फरके राखे के सगरी जतन कइली। अगर राहुल का जगहा प्रियंका लगे कांग्रेस के कमान रहीत त शायद ओकर ई दुर्गति ना होखीत। आ अबहीं त असल दुर्गति होखल बाकी बा।

मौजूदा राजनीतिक उठापटक का पीछे के खेल

पहिले जब दल बदलू कवनो दल में शामिल होखत रहलें त दल के मूल सदस्य एह बात के खिलाफत करत रहसु। जवन आदमी चुनाव में उनुका के हरवलसि उहे जब अपने दल में आ जाव त उहे नू होखी – दुअरा सवतिया के पिया के बरतिया, देखि देखि फाटे रामा पथरो के छतिया!

एह उठापटक का पीछे भाजपा के ई सोच बा कि तिसरका बेर सरकार में अइला का बाद ऊ सब कुछ कर लेबे के बा जवना चलते 2024 का चुनाव में ओकर ताकत घट गइल। तब चार सौ के पार वाला नारा भाजपा के नुकसान करा दिहलसि। सभे के लागल कि आखिर चार सौ के पार कवन मजबूरी बा? एकरा पाछा के मकसद का बा? अब भाजपा खुला खेल खेल रहल बिया। ओकरा हर हालत में लोकसभा आ राज्यसभा में दू तिहाई बहुमत चाहीं। एह बहुमत खातिर ऊ अगिला चुनाव के इंतजार कइल नइखे चाहत। कारण साफ बा – चुनाव के का भरोसा, जनता कब अर्श से फर्श पर पटक देव!

संसद में दू तिहाई बहुमत काहे ला

भाजपा आपन तीन गो पुरान सपना पूरा कर दिहलसि- भगवान श्रीराम के मंदिर बन गइल, कश्मीर से धारा 370 हटा दीहल गइल आ पूरा देश में समान नागरिकता कानून का दिशाई डेग पर डेग बढ़ल जात बा। रह गइल समस्या नयका सपनन के पूरावे के। ई बाड़ी सँ महिला आरक्षण, परिसीमन, आ एक देश में एक चुनाव। ई तीनो मसला हल करे खातिर संसद के दुनू सदन में दू तिहाई बहुमत होखल जरूरी बा।

आ एही मकसद ला भाजपा सगरी तोड़फोड़ में लाग गइल बिया। ओकरा हर हाल में दू तिहाई बहुमत जुटावे के बा। आ एके साधै सब सधै वाला सिद्धांत से ओकरा मालूम बा कि ई काम हो जाव त बाकी सगरी काम हो जाई। मनमाफिक संविधान संशोधन हो जाई। पूरा देश में लोकसभा आ विधानसभा के सीटन के परिसीमन हो जाई आ सीट पहिले से डेढ़ा हो जाई। सीट बढ़ला का बाद दलबदलूवन के टिकावल-ठहरावल आसान हो जाई। दल के भीतर के असंतोषो पर काबू पावल जा सकी। आ एक देश में एक चुनाव का साथही अगर राष्ट्रपति प्रणाली के चुनाव करावे के जोगाड़ बईठ जाव तब फेर का पूछे के बा।

संविधान में बदलाव : अवसर आ आशंका

संविधान के निर्माता लोग खुद संशोधन के व्यवस्था बना के रखले रहलन। एहसे जरूरत का हिसाब से संविधान में बदलाव करे के व्यवस्था बना दीहल गइल। काहे कि भविष्य में का हो सकेला. कवन नीति रीति चलावे के जरुरत बा ई पहिले से ना बतावल जा सके। बाकिर अब जवन संभावना – जवना के अनेसा कहल बेसी सही होखी – बन रहल ओह पर विचार करे के जरूरत बा।

अगर संभावना के बात कइल जाव त कहल जा सकेला कि –
राजनीतिक स्थिरता बढ़ जाई।
जरूरी सुधार आ बदलाव आसानी से कइल जा सकी।
नीति निर्माण के प्रक्रिया तेज हो जाई।
एक देश में एक चुनाव वाला पुरनका प्रणाली फेर आ जाव त हर समय चुनाव के माहौल बनल रहला के समस्या से मुक्ति मिल जाई।

बाकिर अनेसा का बारे में ना सोचल आत्मघाती होखी –

जवन कुछ करे के बात हो रहल बा तवना से –
विपक्ष के भूमिका कमजोर हो जाई।
लोकतंत्र का माध्यम से एकदलीय व्यवस्था बने के डर बा।
दलबदल के संस्कृति मतदाता के भरोसा कम कर सकेली।
शक्ति आ सत्ता के केंद्रीकरण हो जाई। यूपी के दो लड़के कुछ करसु, कर सकसु भा ना, दू गो महारथी आपन सत्ता के मजबूत बना लिहे।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व आ संघीय संतुलन पर सवाल उठे के अनेसा बन सकेला।

होइहें वही जो राम रचि राखा –

भारत के जनमानस अपना आस्था से मानेला कि जवन कुछ हो रहल बा तवन भगवान के ईच्छा से हो रहल बा। आम आदमी के कई बेर ई सब समझ में ना आवे बाकिर भगवान सब कुछ देखेलें आ ऊ जवन करीहें तवन हमहन के दीर्घकालीन फायदा ला होखी।

जइसन के अनेसा बा भारत में एगो अइसन अनूठा तानाशाही के स्थापना हो जाई जवना में विरोध करे के पूरा छूठ होखी बाकिर ओह विरोध के प्रभावी बनावे के ताकत बा रह जाई जनता का लगे। काक्रोचो हतप्रभ हो गइल रहुवे जब हवाई जहाज से उरला का बाद हवाईए अड्डा पर बिना मंगले ओकरा प्रदर्शन के इजाजत मिल गइल रहुवे। काक्रोचन के सगरी प्लान छितरा गइल रहुवे आ सब कुछ टाँय-टाँय फिस्स हो के रह गइल।

 

 

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