सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-45
आइल भोजपुरिया चिट्ठी
घीव के टेढ़ो लड्डू ओतने नीक लागेला
अखबार में पिंड़िया के जीआई टैग वाला समाचार पढ़िके काकी खोनसाइल रहली- ‘पीड़िया’ शब्द कुछ अटपटा नइखे लागत?
लभेरन कहले- रउआँ ठीके कहतानी। सही शब्द त ‘पिंड़िया’ होखे के चाहीं। बाकिर मीडिया में जवना के प्रयोग ढेर कइल जाई, ऊहे नू चर्चित आ स्थापित होई?
“तबहुँओ, तू त बित्पत्ती-ओत्पत्ती क के ओकर सही रूप बताइए सकतारऽ?”- काकी आपन जिज्ञासा प्रकट कइली।

लभेरन कहले- “पिंड़िया के भाषिक विकास संस्कृत का पिंड भा पिंडी से भइल होई, अइसन लागत बा। अइसन एहसे कहतानी कि एह पर्व के मुख्य पहचान गोबर के पिंडी हटे। संस्कृत पिण्ड के माने भइल- गोलाकार पिंड भा लोंदा, शरीर, चावल, आटा, मिट्टी भा गोबर के बनावल गइल गोल टुकड़ा। पिंडी ओकरा छोट आकार के कहल जा सकऽता। ‘पिंड़िया’ पर्व में बेटी-बहिनि देवालि पर गोबर के छोट-छोट पिंड (उभार) बनावेलिन आ ओकर पूजा करेलिन अउर बाद में एक साथ मिलिके ओकर विसर्जन करेलिन। हमरा बुझाता जे ईहे पिंडी बाद में ‘पिंड़िया’ बन गइल होई।”
काकी सवाल दगली- ‘पिंड़िया’ काहें, ‘पिड़िया’ नइखे हो सकत?
भोजपुरी में अनुनासिकता के प्रवृत्ति
लभेरन कहले- बिलकुल! ऊहो हो सकत बा, बाकिर भोजपुरी के प्रकृति भिन्न बा। भोजपुरी में अनुनासिकता के प्रवृत्ति बहुत बरियार बा। एही से हिंदी के कई गो शब्द भोजपुरी में आवत-आवत अनुनासिक हो जाला। हिंदी से भोजपुरी के एह तरह के कुछ उदाहरण देखीं-
भेजना/भेंजल, सेकना/सेंकल, बेचना/बेंचल, जैसा/जइसन, देह/देंहि। हालाँकि भिन्न-भिन्न क्षेत्रन का भोजपुरी में भाषायी एकरूपता नइखे। कहीं-कहीं अनुनासिक नाहिंयो हो सकत बा आ लोक में ऊहे स्वीकार्य बा। एह सबका बादो ‘पीड़िया’ शब्द खातिर हमरा कवनो कारण नइखे लागत, कवनो भाषाशास्त्रिए ओकरा पर प्रकाश डाल सकऽतारे।”
“चलऽ संतोष हो गइल। अब तनी ‘जी टैग’ का बारे में बताव। एकरा से कुछ लाभो बा कि खाली फोटो लटकावे का काम में आई?” काकी बोलली।
‘जी टैग’ का बारे में
लभेरन बतावे शुरू कइले-
समाचार पत्रन में छपल समाचार से त अतने बुझाता कि भोजपुरी चित्रकला का पिंड़िया पेंटिंग के GI टैग मिले के सार्वजनिक घोषणा 14 जून 2026 के बिहार सरकार के जनसंपर्क विभाग आ नाबार्ड आदि का ओरि से 14 जून 2026 के सूचना जारी कइके कइल गइल। अभी ओकरा रजिस्ट्री के आवेदन संख्या, अउर पंजीकरण के सटीक कानूनी तिथि प्रकाशित नइखे कइल गइल।
जी आई (Geographical Indication) टैग एगो कानूनी पहचान हटे, जवन कवनो विशेष क्षेत्र का विशिष्ट वस्तु, कला, शिल्प भा कृषि उत्पाद के दीहल जाला। एकर माने ई भइल कि ओह चीज के विशेष पहचान आ प्रतिष्ठा ओकरा भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ल बाटे; जइसे दार्जिलिंग चाय, मखाना, मधुबनी पेंटिंग ओगैरह। पिंड़िया भोजपुरी क्षेत्र के एगो पारंपरिक लोक चित्रकला हटे। एकर संबंध लोकजीवन, देवी-देवता, विवाह-संस्कार, प्रकृति अउर ग्रामीण संस्कृति से बाटे।
भोजपुरी क्षेत्र का सांस्कृतिक पहचान के औपचारिक मान्यता
जी आई टैग मिलला से एह कला के आधिकारिक पहचान बनला अउर एकर परंपरा के संरक्षणो में मदत मिली। एकरा सङहीं दोसरा क्षेत्र के लोग ओह नाँव से उत्पाद बेंचिके कमा ना पाई। एकरा से कलाकारो लोगन के कमाई बढ़ सकऽतिया। ऊहन लोग का कलाकृति के दामो बढ़ सकऽता आ नीमन से नीमन बाजारो भेंटा सकत बा। जाहिर बा, एकरा से समय-समय पर सरकारी सहायतो मिल सकेले। जी आई टैग के एगो ‘पहचान अउर कानूनी संरक्षण’ का रूप में समुझल ठीक रही। ओइसे एहमें कवनो संदेह नइखे कि अब एह कला के बिहार आ भोजपुरी क्षेत्र के विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर का रूप में खूब प्रचार होई। जानऽतानी काकी! बिहार का मधुबनी चित्रकला के प्रचार-प्रसार त बहुत दिन से हो रहल बा, देश-विदेश में ओहके प्रसिद्धि मिलल बाकिर भोजपुरी चित्रकला के केहूँ पुछनिहार ना रहे। जी आई टैग से एह कला के राष्ट्रीय आ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग पहचान मिले के संभावना अब बढ़ि गइल बा। एक तरह से कहीं त ई भोजपुरी क्षेत्र का सांस्कृतिक पहचान के औपचारिक मान्यता कहल जाई। अब भोजपुरी के महंथ लोग के भी जिमवारी बढ़ि गइल बा।
काकी कहली- “अब का चाहीं, बहुत बड़ काम हो गइल, तहरा त पाटी देबे के चाहीं। अब लागले लागल ईहो बता द कि पिंड़िया का अलावे अउरू कवनो चित्रकला बाटे भोजपुरी के?”
लभेरन कहले- बड़ले बा। कोहबर चित्रकला भोजपुरी के एगो अउर प्रसिद्ध लोकशैली हटे। कोहबर शैली के चित्रकला बियाह, दांपत्य जीवन आ मांगलिक प्रतीकन से जुड़ल बाटे।
काकी बहुत खुश भइली। “चलऽ जब एकरा से अतना फायदा बा त ‘पीड़िया’ रहो भा ‘पिंड़िया’, एहसे कतना फरक परी? लोग त बूझिए जाई नू? एगो खीसा कहाला कि घीव के टेढ़ो लड्डू ओतने नीक लागेला।”
अतने में काकी के नतिया जाने खातिर परेशान हो गइले सँ कि पिंड़िया का होला। तब लभेरन बतावे शुरू कइले।
अपना भाई के उमिरि बढ़ावे खातिर बहिनि सभ पिंड़िया के ब्रत करेली सन। कातिक का अँजोर में गोधन कुँटइला का बाद एकर शुरुआत होला आ लगभग एक महीना तक चलेला। एह दौरान गाँव के लइकी आ मेहरारू घर का देवालि पर गोबर से छोट-छोट पिंड़िया बनावेली सन आ रोज ओकर पूजा करेली सन। एह पारी के देखिहऽ लोग, बहुत नीमन लागी।
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संपर्क : डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल, निकट- पिपरा प्राइमरी गवर्नमेंट स्कूल, देवनगर, पोल नं. 28</e
पो. – मनोहरपुर कछुआरा, पटना-800030


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