Tag: पाती

धर्म: बदलत रूप बिगड़त माहौल

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 21वी प्रस्तुति) – सुशील कुमार तिवारी जइसन कि धर्म ग्रंथन में कहल गइल बा ‘धरेतिसः धर्मः’। माने कि देश अउर काल के हिसाब से उचित अनुचित के निर्धरण कइल आ ओकेरा अनुसार व्यवहार कइल...

Read More

फागुनः दू गो गीत

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 20वी प्रस्तुति) – कमलेश राय एक अंग-अंग मिसिरी में बोर गइल फागुन रस घेर गइल! पतझर के पीरा के हियरा से बिसरा के थिरकि उठल बगियन में गांछ-गांछ अगरा के डाढि आज सगरी लरकोर भइल!...

Read More

रिगवनी

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 19वी प्रस्तुति) – अनन्त प्रसाद ‘रामभरोसे’ भोजपुरिहा कतनो परेशानी में रहिहन, मोका पावते केहू से हँसी-मजाक करे से बाज ना अइहन. केहू के रिगावल आ रिगला पर लिहाड़ी लिहल, एने का लोगन...

Read More

दू गो छोटहन कहानी

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 18वी प्रस्तुति) – विनोद द्विवेदी (एक) रोगी ले ढेर बैद मुहल्ला में रिंकू सिंह के बोखार लागल त पड़ोस के कई लोग देखे पहुँचल. केहु कहल काढ़ा, केहु कहल क्रोसिन आ केहू हकीम जी के चटनी...

Read More

हम जरूर आइबि !

(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 17वी प्रस्तुति) – गदाधर सिंह हम ओह राति में अधनिनियाँ में रहीं. अचके में हमार खटिया हिलल, खट-पट भइल आ हमार आँखि खुलि गइल. हम का देखतानी कि हमरा खाटी के ठीक लगे एगो पाँच-छव...

Read More

Recent Posts