गजल
– अशोक द्विवेदी आपन भाषा आपन गाँव, सुबहित मिलल न अबले ठाँव । दउरत-हाँफत,जरत घाम में, जोहीं रोज पसर भर छाँव । जिनिगी जुआ भइल शकुनी के, हम्हीं जुधिष्ठिर, हारीं दाँव । कमरी ओढ़ले लोग मिलत बा केकर केकर लीहीं नाँव । जरलो पर बा...
Read More– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी होरी आइल बा जरत देश बा-धू धू कईके सद्बुद्धि बिलाइल बा. कइसे कहीं कि होरी आइल बा. चंद फितरती लोग बिगाड़ें मनई इनकर नियत न ताड़ें मगज मराइल ए बेरा मे भा कवनों चुरइल समाइल बा. कइसे कहीं कि होरी आइल बा....
Read More– डाॅ. अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर झरे फेरु उतरेले भुइंयाँ किरिनियाँ सरेहिया में मोती चरे ! सुति उठि दउरेले नन्हकी उघारे गोड़े दादी धरे बुला एही रे नेहे हरसिंगरवा दुअरवा प’ रोजे झरे बुची...
Read More– डा0 अशोक द्विवेदी सुतल बा जागि के जे, ओके का जगइबऽ तूँ ? घीव गोंइठा में भला कतना ले सुखइबऽ तूँ ? बनल बा बेंग इहाँ कतने लोग कुइंयाँ के नदी, तलाब, समुन्दर के, का देखइबऽ तूँ । बा जरतपन के आगि पेट में सुनुगत कबसे उ अगर लहक...
Read More– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ भाषिक, सांस्कृतिक आ बौद्धिक गुलामी एतना ना मेहीं (बारीक) चीज ह कि एकरा गुलाम का पतो ना चले कि ऊ एह सबके कब से गुलाम बा. ई गुलामी ओकरा उपलब्धि जइसन महसूस होला. ओकरा आगे भाषिक अस्मिताबोध...
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