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भोजपुरी भाषी के मातृभाषाई के अस्मिताबोध – 3

– डॅा० जयकान्त सिंह ‘जय’ वैदिककाल होखे भा पौराणिककाल, ऐतिहासिक काल होखे भा आधुनिक काल, भोजपुरी भाषी जनसमुदाय राष्ट्र अउर राष्ट्र के भाषा-संस्कृति, सम्मान-स्वाभिमान आ उत्थान-पहचान खातिर कवनो तरह के बलिदान देवे...

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गज़ल

– डा0 अशोक द्विवेदी हुक्मरानन का खुशी पर फेरु मिट जाई समाज अपना अपना घर का आगा, खोन ली खाई समाज । कर चुकल बा आदमी तय सफर लाखन कोस के घूम फिर के कुछ समय में, का उहें आई समाज ? जुल्म से भा जबरजस्ती ना बसे बस्ती कहीं बसी त...

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गज़ल : उरुवा लिखीं, उजबक लिखीं कि बेहया लिखीं

– डा0 अशोक द्विवेदी एह बेशरम-अनेति पर अउँजा के, का लिखीं उरुवा लिखीं, उजबक लिखीं कि बेहया लिखीं लंपट आ नीच लोग बा इहवाँ गिरोहबन्द सोझबक शरीफ के बा बहुत दुरदसा लिखीं लँगटे-उघार देहि से, दिल से दिमाग से अइसनका लोग ढेर बा,अब...

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भकुआइल बबुआ

– जयशंकर प्रसाद द्विवेदी माटी के थाती छोड़ी जब से पराइल बा, नीमन बबुआ तभिए से भकुआइल बा ॥ जिनगी के अहार न विचार परसार टुटल घर आ दुआर बहत दुखे के बेयार । सोगहग नहीं कुछो कुल्हिए पिसाइल बा ॥ नीमन बबुआ….. हसी ठठा गइल...

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गज़ल

– डा0 अशोक द्विवेदी नेह-छोह रस-पागल बोली उड़ल गाँव के हँसी-ठिठोली. घर- घर मंगल बाँटे वाली कहाँ गइल चिरइन के बोली. सुधियन में अजिया उभरेली जतने मयगर, ओतने भोली. दइब क लीला-दीठि निराली दुख- सुख खेलें आँख मिचोली. हिलल पात,...

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