Tag: भोजपुरी

बनचरी (भोजपुरी के कालजयी उपन्यास के छठवी कड़ी)

– डा॰ अशोक द्विवेदी अइसे त प्रकृति के एक से बढ़ि के एक अछूता, अनदेखा मनोहारी रूप ओह विशाल बनक्षेत्र में रहे बाकिर कई गो मुग्ध करे वाला जगह, हिडिमा घूमत-फिरत देखले-जनले रहे. सबेरे माता जब ओके भीम का सँग खुला आहार-बिहार आ...

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बनचरी (भोजपुरी के कालजयी उपन्यास के पँचवी कड़ी)

– डा॰ अशोक द्विवेदी स्नान-पूजा का बाद जब कुन्ती अनमनाइल मन से कुछ सोचत रहली बेटा भीम का सँगे बाहर एगो फेंड़ का नीचे हँसी-ठहाका में रहलन स. हिडिमा के पास आवत देखि कुन्ती पुछली – – ‘बेटी ए स्थान के आसपास, कहीं...

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गुलजारी लाल के जूता

– देवेन्द्र कुमार गुलजारी लाल जी आपन संघतिया मनमौजी के संगे साप्ताहिक बाजार मंगला हाट में हफ्ता भर के जरूरी सामान के खरीदारी करे खातिर गइल रहलें. दूनो संघतिया बाजार में घूमत-फिरत आपन जरूरत के मुताबिक सर-सामान खरीदत रहलें....

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गौरैया

– केशव मोहन पाण्डेय जइसे दूध-दही ढोवे सबके सेहत के चिंता करे वाला गाँव के ग्वालिन हऽ गौरैया एक-एक फूल के चिन्हें वाला मालिन हऽ। अँचरा के खोंइछा ह विदाई के बयना हऽ अधर के मुस्कान ह लोर भरल नैना हऽ। चूडि़हारिन जस सबके घर के...

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पत्नी आ धर्म पत्नी

– जयंती पांडेय बाबा लस्टमानंद अक्सर अपना मेहरारू के केहु से परिचय करइहें त कहिहें कि ई हमार पत्नी हईं. रामचेला एकदिन पूछ बइठले – हो बाबा! तू , भउजी के धरमपत्नी काहे ना कहेलऽ? सब लोग त अपना मेहरारू के धर्मपत्नी कहेला....

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