Tag: बतकुच्चन

बतकुच्चन – ५९

आजु जब बतकुच्चन लिखे बइठल बानी त सामने दू गो मौत के खबर पड़ल बा. एगो चंदौली के भोजपुरी कवि रामजियावन दास बावला के आ दोसरका गोरखपुर के आचार्य प्रतापादित्य के. अब बतकुच्चन के ई विषय त ह ना बाकिर दिमाग जे बा से कि एही पर अटक के रहि...

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बतकुच्चन – ५८

भाषा संस्कार से बनेला कि भाषा से संस्कार बनेला एह बाति पर ढेरहन बतकुच्चन कइल जा सकेला. बाकिर एह बाति पर ना कि साहित्य समाज के दर्पण होले. साहित्य के रूप हर समय बदलत रहेला आ आजु के साहित्य में एसएमएस, ट्विट भा फेसबुक अपडेट शामिल...

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बतकुच्चन – ५७

जमाना खराब हो गइल बा. कब केकरा कवन बाति बाउर लाग जाई आ ऊ रउरा के कूटे लागी कहल ना जा सके. विदूषक, बतबनवा, लबार, कामेडियन आ कार्टूनिस्टन के पिटाए के अनेसा हमेशा बनल रहेला. हमार मुंह टेढ़ काहे बनवले, चल हम तोर मुँह टेढ़ कर देत बानी....

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बतकुच्चन – ५६

भाषा भोजपुरी से हमार परिचय नौ बरीस से बा. एह बीच बहुते तरह के लोग से भेंट भइल. कुछ ओह लोग से जे भोजपुरी में आपन धंधा करत बा त कुछ ओहू लोग से जे भोजपुरिए के आपन धंधा बना लिहले बा. सोचीं त दुनु में कवनो खास अंतर ना बुझाई बाकिर गौर...

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बतकुच्चन – ५५

हमरा लागत बा कि जवन हो रहल बा से ना होखे के चाहत रहुवे, जवन कहल सुनल जात बा से ना कहल सुनल चाहत रहुवे. काहें कि एह सबसे दुश्मन के सेतींहे हमनी के कमजोरी भेंटा जात बा. सेंत मेंत में हमनी का आपन कमजोरी दुनिया के देखवले बतवले जात...

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