बतकुच्चन – ५४
हालही में एगो कविता के कुछ लाइन पढ़े के मिलल “मटिया क गगरी पिरितिया क उझुकुन / जोगवत जिनिगी ओराइ / सगरी उमिरिया दरदिया के बखरा / छतिया के अगिया धुँआइ”. पढ़ला का बाद अपना बतकुचनिया सुभाव का चलते मन उचके लागल, सोचे लागल...
Read Moreहालही में एगो कविता के कुछ लाइन पढ़े के मिलल “मटिया क गगरी पिरितिया क उझुकुन / जोगवत जिनिगी ओराइ / सगरी उमिरिया दरदिया के बखरा / छतिया के अगिया धुँआइ”. पढ़ला का बाद अपना बतकुचनिया सुभाव का चलते मन उचके लागल, सोचे लागल...
Read Moreएगो कहाउत ह “राड़, साँढ़, सीढ़ी, सन्यासी | एहसे बचे त सेवे काशी”. कहाउत कहल त गइल बा काशी का बारे में जहाँ के राड़, ठग, सीढ़ी आ साधु सबही एकसे बढ़िके एक होलें. बतकु्च्चन में राड़ आ राँड़ के फरक के चरचा पहिले हो चुकल बा. एह...
Read Moreफगुआ बीतल चइत आ गइल. फगुआ का दिने निकलल होरिहारन के टोली भर दिन फगुआ गवला का बाद चइता गा के नयका साल के स्वागत कइलन. फगुआ आ चइता दुनु के शुरुआत हमेशा देवी वन्दना से होला. सुमिरिले मतवा, जोड़ीले दुनु हथवा हो रामा/ कण्ठे सुरवा/...
Read Moreपिछला बेर बत्ती जरावे भा चालू करे भा रोशन करे के बाति निकलल रहुवे. आखिर ले कवनो राह ना लउकल कि बत्ती के का कइल जाव. एक हफ्ता ले सोचलो पर कवनो दोसर राह ना भेंटाइल. ले दे के इहे बुझात बा कि बत्ती अबही कुछेक साल ले जरबे करी काहे कि...
Read Moreभाषा अपना समाज के दरसावेला, ओकरा माहौल के देखावेला. एही चलते अलग अलग जगहा के लोग अलग अलग भाषा बोलेला. कई बेर भा अधिकतर एक जगहा के भाषा दोसरा जगहा के आदमी ना बुझ पावे. एक भाषा में जवन शब्द खराब भा फूहड़ मानल जाला हो सकेला कि दोसरा...
Read More