गीत
– डा॰अशोक द्विवेदी रतिया झरेले जलबुनिया फजीरे बनि झालर, झरे फेरु उतरले भुइयाँ किरिनिया सरेहिया में मोती चरे ! सिहरेला तन, मन बिहरे बेयरिया से पात हिले रात सितिया नहाइल कलियन क, रहि-रहि ओठ खुले फेरू पंखुरिन अँटकल पनिया चुवत...
Read More– जयंती पांडेय जबसे तरह तरह के घोटाला के केस में नेता लोग दनादन जेल जाये लागल तबसे रामचेला बड़ा मायूस हो गइले. मुँह सड़ल आम अस बना लिहले आ चेहरा ओल अस लटका लिहले. बाबा लस्टमानंद के बड़ा माया लागल. लगे जा के पूछले, का हो...
Read Moreबनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मौजूदा शैक्षणिक सत्र से भोजपुरी में डिप्लोमा आ सर्टिफिकेट कोर्स के शुरूआत होखे जा रहल बा. एक साल के पीजी डिप्लोमा पूर्णकालिक होखी. दू साल वाला कोर्स पार्ट टाइम में कइल जा सकेला. चार महीना के एगो कम...
Read More– जयंती पांडेय हम भ्रष्टाचार के भविष्य के ले के निश्चिंत बानी. ई एकदम सत्य ह कि खाली हमनिये के देस में भ्रष्टाचार अउर भ्रष्टाचारियन खातिर तमाम संभावना आ सुविधा बा. हमनिये के ई हुनर हऽ कि हमनी का कतहियों, कबहुँओं करप्शन के...
Read MorePosted by Editor | Sep 29, 2011 | पुस्तक चर्चा |
पाती के नयका अंक बेहतरीन कागज पर बढ़िया सफाई का साथ प्रकाशित भइल बा. बाकिर कुछ तकनीकि गलती से एकर सूची वाला पन्ना के पीडीएफ पढ़ात नइखे. अह अंक में बावे नया लोकतंत्र के सपना (संपादकीय), लोकतंत्र में लोकभावना के बेमिसाल जीत (अन्ना...
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