मस्त फगुनवा
– ओ.पी. अमृतांशु रंग – अबिरवा लेके गुललवा मस्त फगुनवा आईल बा. केने बाड़ी पुरूवा रानी पछेया बउराईल बा. सरसों फुलाइल, लहराइल बा तीसी, मटर के ढेंढी देखावे बतीसी, झपड़-झपड़ गेहूमा के बालवा कचरी पे लोभाइल बा. मोजरा से रस...
Read More– ओ.पी. अमृतांशु रंग – अबिरवा लेके गुललवा मस्त फगुनवा आईल बा. केने बाड़ी पुरूवा रानी पछेया बउराईल बा. सरसों फुलाइल, लहराइल बा तीसी, मटर के ढेंढी देखावे बतीसी, झपड़-झपड़ गेहूमा के बालवा कचरी पे लोभाइल बा. मोजरा से रस...
Read Moreपिछला बेर बत्ती जरावे भा चालू करे भा रोशन करे के बाति निकलल रहुवे. आखिर ले कवनो राह ना लउकल कि बत्ती के का कइल जाव. एक हफ्ता ले सोचलो पर कवनो दोसर राह ना भेंटाइल. ले दे के इहे बुझात बा कि बत्ती अबही कुछेक साल ले जरबे करी काहे कि...
Read Moreभाषा अपना समाज के दरसावेला, ओकरा माहौल के देखावेला. एही चलते अलग अलग जगहा के लोग अलग अलग भाषा बोलेला. कई बेर भा अधिकतर एक जगहा के भाषा दोसरा जगहा के आदमी ना बुझ पावे. एक भाषा में जवन शब्द खराब भा फूहड़ मानल जाला हो सकेला कि दोसरा...
Read MorePosted by Editor | Feb 27, 2012 | पुस्तक चर्चा, साहित्य |
‘ हिन्दी में सम्पादकीय की परम्परा खत्म हो रही है. साहित्य और पत्रकारिता एक दूसरे से विछिन्न हो रहे हैं, वहीं अखबार दैनिक साहित्य है जो जितना कालातीत होता है उतना ही तात्कालिक भी होता है. अखबार तात्कालिकता का आईना है.’ ई कहना रहे...
Read Moreएक त चोरी ओह पर से सीनाजोरी. पिछला दिने कुछ कुछ अइसने वाकया देखे के मिलल जब बरियार चोर सेन्हे पर बिरहा गावे लगले. आ पहरेदार बेचारा सीटी बजावल छोड़ कुछ ना कर सकत रहे. अब चोर का बारे में थोड़ देर बाद. पहिले सेन्ह का बारे में बतिया...
Read More
Recent Comments