किसान संस्कृति के विस्तृत कैनवास : रोपनहारिन के हथेली
- कनक किशोर

(समीक्षा)

किसान संस्कृति के विस्तृत कैनवास : रोपनहारिन के हथेली

(1.)

कविता के युवा स्वर गोलेन्द्र पटेल आजु साहित्य जगत में आपन विशेष परिचय अपना बौद्धिक आ अभिव्यक्ति क्षमता के आधार पर बना चुकल बाड़े। कबीर के गाँव के बगल के रहनिहार गोलेन्द्र में कबीर वाला ठसक देखे के मिलेला। गोलेन्द्र के ठसक उनुका भीतर के अहं ना ह, ऊ आत्मसम्मान के स्वर ह। गोलेन्द्र के इहे गुण उनुका के आज के बाजारवाद में पल – बढ़ रहल कवि लोगिन से अलग खड़ा कर देला। हम गोलेन्द्र के कवि कहीं कि माटी के चित्रकार कहीं ई ना समझ पावेनीं। हम एह आलेख में उनुकर एगो लमहर कविता ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ पर तनी विस्तार से बतकही एहिजा करब आ ओही आधार पर रउआ निर्णय लेवे के बा कि रोपनहारिन के कवि – कवि कि माटी के चित्रकार? एगो अउर संशय एह कविता के लेके हमरा समक्ष बा कि एह कविता के हम किसान विमर्श में रखीं कि स्त्री विमर्श में? माटी के कथा कहीं कि संस्कृति के गाथा? बाकिर ई कविता के पूर्णता आ गहराई से गुजरला पर ई बात साफ हो गइल कि माटी, संस्कृति, किसान आ स्त्री के एक दूसरा से जुड़ाव देखत इन्हिन के अलग – अलग देखल ठीक ना होई।अइसे ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ कविता पर विस्तार से बात एह आलेख में आगे होखी बाकिर संक्षेप में कहे के होखी त हम लक्ष्मीकांत मुकुल के एगो कविता के अंश लेके इहे कहब –

” ओह लोग के हथेली में माटी बा,
माटी में पसीना,
आ पसीना में पूरा घर के भविष्य। ”
( रोपनी के बीच औरतन के गीत )

आ कवि गोलेन्द्र पटेल के सबदन में कहब त कहब कि-

” आ तब
बुझाइल
धरती के सभसे पहिलका विश्वविद्यालय
खेत ह
ओकर सभसे बड़ पुस्तकालय
कोठार ह
सभसे बड़ पाठशाला
खलिहान ह
सभसे बड़ गुरुकुल
रोपनी के पाँत ह
सभसे बड़ शिक्षक
किसान ह
सभसे बड़ शिक्षिका
रोपनहारिन ह
सभसे बड़ शास्त्र
माटी ह
सभसे बड़ भाषा
पसीना ह
सभसे बड़ अक्षर
बीज ह
सभसे बड़ कविता
धान के हरियर लहर ह
सभसे बड़ संगीत
रोपनी-गीत ह
सभसे बड़ पूजा
बिचड़ा रोपल ह
सभसे बड़ आरती
पहिलका कौर धरती के अर्पण कइल ह
सभसे बड़ तपस्या
भूख के खिलाफ खेत में उतरना ह
सभसे बड़ विजय
कवनो युद्ध जीतल ना
बलुक
एगो दाना उगा लिहल ह।”

एकरा बाद कहाँ कुछ कहे के रह गइल कि किसानी संस्कृति का ह? किसानी संस्कृति में रोपनहारिन का ह? कविता के शीर्षक ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ के गहिर भाव अभिव्यक्त करत सत्य उहे कवि लिख सकेला जे कृषि संस्कृति के परत दर परत सच्चाई से, माटी के पुकार से, किसान के गोहर से परिचित होखे। ई कविता कृषक संस्कृति के रोपनी से अन्न के कोठिला में पहुंचे से लेके रोटी, भूख आ श्रम के विस्तृत कैनवास पर खींचल रेखाचित्र ह। एकरा में माटी आ किसान के धड़कन महसूस कइल जा सकेला। एह बतकही के उदेस कविता के वैचारिक परतन के उघारल भर बा जे हमनीं के माटी में रचल – बसल बा। कवि के सिरिजन के अंतःस्वर के पकड़े के एगो छोट प्रयास भर ह ई आलेख।

(2.)

एह कविता के शीर्षक के देखत हमरा आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘ चेतन ‘ के बात इयाद पड़ जात बा जे एही रोपनहारिन पर ‘ हरियरी रोपत हथेली ‘ नाम के काब्य संकलन के भूमिका में लिखले बानीं कि – ‘ ई साफ जाहिर होता कि एह संकलन में श्रमजीवी वर्ग के मानसिक आ सारीरिक पीड़ा मुखर हो गइल बा। हाथ भले हरियरी रोपत होखे बाकिर रोपनी में डांड – पीठ एक हो जाला । देखे में हरियरी मन के त खूब लुभावेला , सुंदर लागेला बाकिर ओकरा पीछे मेहनत के जवन दर्द छिपल होला ओकर अनुभव सब केहू नइखे कर सकत। ई दर्द भा पीड़ा ‘ हरियरी ‘ के रूपक बनाके लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त भइल बा। जवन हथेली हरियरी रोपेले उ खुरदुरा हो जाले। ओकर सुंदरता ख़तम हो जाला। ओह लोगीन के पूरा जिनगी दोसरा केहू खातिर हरियरी रोपत ख़तम हो जाला, बाकिर आपन जिनगी मुरझाइले – मुरझाइल ख़तम हो जाला।’ कृषि संस्कृति के समृद्धता के भीतर खींचल दर्द के लकीर में खेत के कादो से कोठिला तक, कोठिला से चुल्हा तक एगो स्त्री – रोपनहारिन के चरित भरपूर देखे – सुने में मिलत बा ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ में।कविता ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ किसानी संस्कृति के अपना आप में एगो पूर्ण कविता बिया जवन माटी, रोपनी, अन्न उत्पादन, रोटी, भूख, सामाजिक सरोकार, श्रम गीत के साथ जीवंत संवाद स्थापित करत बिया। कविता में हुलास बा निराश ना जे कविता के संगीतमय प्रवाह देत बा। कवि कविता के माध्यम से अइसन विचार के दुनिया में खींच ले जात बा जहाँ कृषि संस्कृति अपना बेयापक माने में जीवन साक्ष्य से रूबरू करावत बा। खेतीहर के मेहनत की गीत ह ई कविता। कुछ लोग एह तरह के कविता के नकार देला कि मशीनरी आ डिजिटल जुग में आन जमाना के बाति कह के चलते, ई कह के कि अब ई कहँवा नजर आवत बा। समय भले बदल गइल विकास के झुनझुना पकड़ बाकिर गाँव के कृषि संस्कृति इहे ह। लोगिन के भावना एही किसान संस्कृति से जुड़ल बा, कृषि संस्कृति के जड़ इहे ह, बेजान ट्रैक्टर, हारवेस्टर से मानवीय संवेदना के जुड़ाव ना हो सकेला। बाजारवाद का समझी एह कृषि संस्कृति के? कविता के संरचना आ ओकर अंतर धारा के मूल भाव में ‘ रोपनहारिन ‘ के जीवन गाथा बा। कविता इहो स्पष्ट रूप से इशारा करत बा कि रोपनहारिन के खाली रोपन काम तक सीमित ना कइल जा सके। ई कविता अपना तरीका से रोपनहारिन के माध्यम से किसान संस्कृति के समकालीन यथार्थ के हर पक्ष के उजागर करत बा।

(3.)

ई कविता कृषि संस्कृति के ओह बेयापक किसानी संदर्भ के गाथा कह रहल बा जे खेत तइयार करे, बीच रोपण से कोठिला तक पहुंचे के साथे कृषि संस्कृति आ मौसम के जुड़ाव तक पर भरपूर बाति करत बा। किसान के सिंगार आ उत्सव के हुलास के जड़ में रोपनी के हथेली से बोवत हरियरी होला। गोलेन्द्र के कविता के किसानी गाथा से रूबरू होखले पर चल रहल बतकही के सच्चाई जानल जा सकेला, आईं कविता में ताक- झांक कइल जाय।

कविता के शुरुआत धरती माई, किसान, रोपनहारिन के प्रणाम करत कवि कविता के निचोड़ पहिले कंड़िका में रख देले बाड़न। जहाँ जेठ से अगहन, माटी से मेघ, अन्न, श्रम आ रोपनी के हथेली से उगत हरियरी के वर्णन मिलत बा –

” जेठ के दरार से लेके अगहन के कोठिला तक
मटिया के नेह, मेघ के किरपा
आ मनई के मेहनतिए अन्न जनमावेला
एह जीवनगान के पहिल प्रणाम धरती माई
किसान आ रोपनहारिन के
जेकरा हथेली से हर बरिस सभ्यता फेर हरियर हो जाले।”

अदरा के पेटे बारिस के स्वागत में धरती के उल्लास, बिहन के तइयारी, माटी से उठत सौंध महक के वर्णन में कवि के सब्द –

” आद्रा के पहिले-पहिले मेघ
जब पुरवइया के काँधे पर हाथ धरके
गँवई अँजोर में उतरले
धरती अपना भींजल अँचरा पसार के बोली,
“आवा, अब अन्न के जनम-घरी आ गइल।”
पछिवइया चुप हो गइल
महुआ के पात थिरा गइल
पीपर के पाँखी अपना चोंच समेट लिहलें
बस मेघ के मृदंग बाजल
आ मटियारी धरती के देह
सोंधी गमक से भर उठल।”

अँजोर, अँचरा, पछेया के चुपाइल, पीपर के पाँखि, मेघ के मृदंग जस प्रतीक से कविता के बनत प्रवाह आ खुबसूरती निरेखे जोग बा। ई कवि के भाषा के प्रति सचेतता आ प्रौढ़ता के साक्ष्य बा। मेघ के बुलावा, मेघ के आइल आ धरती के भींजल के बड़ी सुक्ष्मता से दिखावल गइल बा एहिजा।

किसान खेती के बिचड़ा तइयार करे खातिर खेत के पहिले तइयार करेला। ओह क्रम में कादो बनावे, देह से कादो के लिपटला, गोरू, हल, जुआठ, किसान के मेहनत आ धरती के नया रूप के अइसन वर्णन एगो किसान पूत माटी के चित्रकारे कर सकत बा। कवि के स्वर में खींचल रेखाचित्र –

” पलेवा के पानी
धीरे-धीरे बधार में उतरलक
कादो मुसुकाइल
लेह देह से लिपट गइल
गारा हथेली के रेखा पढ़े लागल
कदोहन के घुमाव में
गोरू के साँस
हल के फाल
जुआठ के खड़खड़ाहट
रस्सी के खिंचाव
आ किसान के कपार पर चमकत पसीना
सभे मिलके
धरती के नवका कलेवर गढ़े लगल। “

बिहन खातिर तइयार के क्रम में आगे का कवि कह रहल बा आ ओह खातिर चयनित सबदन, बिम्ब, प्रतिक के खुबसूरती देखे जोग बा –

” हेंगा खेत के सलवट सहलावत चलल
पाटा पानी पर
जइसे कवनो पुरनका बिरहा लिखत होखे
डँड़ार पानी के रोकि के कहे,
“ठहर, ए जिनगी!
एहिजा से हरियर इतिहास फूटे वाला बा।”
मेंड़ के छाती पर
घोंघा धीरे-धीरे चढ़त रहल
आरी पानी के बाँह पकड़ले रहल
चौका, ग्यारी, बारागढ़
अपने-अपने हिस्सा में
आकाश के नील रंग सँजोवत रहलें।”

पाटा से पानी में उठत हलफा में कवि के बिरहा लिखात दिखत बा।’ ठहर, ए जिनिगी/ एहिजा से हरियर इतिहास फूटे वाला बा ‘ के पीछे छिपल सत्य के गहराई आ चौका, कियारी, मेंढ़, घोंघा के बाति, पानी के बाँह पकड़े के बाति गोलेन्द्र जस कविये कर सकेला, दूसर के बस के बाति नइखे।

(4.)

एक तरफ धनहा खेत के मेघ के इंतजार बा त दूसर ओरि बंजर भूमि के आस बा कि कहीं हमरो भाग जनि जाग जाय। बरसात आ धान के खेती के संबंध का होला एह पर कवि के स्वर –

” धानहा खेत
दूर खड़ा मेघ के अँखिया से इशारा करे लागल
उसरो मन-ही-मन सोचल,
“का जाने, एह बरिस
हमरो कोख हरियर हो जाव।”

बियर के खेत में किसान अगहनुआ सपना के उगत देखेला। बिचड़ा के हवा से बतिआवत, धूप आ पानी से जुड़ाव के दृश्य के वर्णन के मनोरम प्रस्तुति किसान कवि के स्वर में –

” बियार के क्यारी में
हरे-हरे सपना फूटे लगल
बेहन के कोख
नन्हका जीवन से भर गइल
बिचड़ा हवा से बतियावत रहल
मोरी धूप पीयत-पीयत हँसत रहल
जड़ के भीतर
पानी चुपचाप लोकगीत गुनगत रहल।”

हरियर फूटत सपना, हवा से बतिआवत, पानी के लोकगीत गावत बिहन किसान के अगहनुआ सपना के अंकुरन ह। पानी, धूप, माटी आ बीज के आपसी संबंध के सुंदर बखान अइसन कहाँ देखे के मिलेला। अप्रतिम, विरल सिरिजन बा गोलेन्द्र के ई कविता ।

किसानी आ नक्षत्र के का संबन्ध होला ओकर नमूना दिखावत कवि घाघ के भूमिका में आ गइल बाड़ें। रोपनी टारल पाप होई ई किसानी के सच्चाई ह। ई सचेत करत कहत बा समय से पहिले चेत किसान ना त हाथ मले के सिवा कुछ ना बांचीं। समय पर ना जगला पर अगहनुआ सपना मरी तब भूख के तांडव देखे के मिली लोक में त पाप लगबे नूं करी।

” बूढ़ किसान
रोहिनी निहारत कहे,
“एह बेर फसल नीक होई।”
दूसरका बूढ़ बोल उठल,
“पुष्य हँसल बा
आद्रा दयालु बा
अब रोपनी टारल पाप होई।”

गाँव आ किसानी खातिर पहिरोपना कवनो उत्सव से बढ़के होला। रोपनियन के उत्साह कविता में देखत बनत बा। काम के उत्साह के आगे रोपनी आपन पीड़ा भुलाई के समय के महत्व देत बाड़ी स। ओकरा खातिर कवि के सब्द –

” टोला-भर में खबर उड़ गइल,
“आज रोपनी उतरी!”
सबेरे-सबेरे
रोपनहारिन सभ
आपन कछौटा कसली
केहू खोमड़ी बाँधलस
केहू छपवा धरलस
केहू अँचरा में कलेवा बाँधलस
चूड़ा, दही, सत्तू, नून-मिरिच
कहीं बासी भात, कहीं हरियर मिरचा
सखी बहिनिया के आवाज देवे लागली,
“चलऽ हो,
सूरुज माथ चढ़े से पहिले
लीह पकड़ लिहल जाव।”

रोपनी आ गीत के संबंध का होला ओकरा के कविता में बड़ी बढ़िया से कवि उकेरले बाड़े। रोपत घरी के एगो गीत –

“रोपब धानवा सइयाँ
हरियर होई धुरवा
बरसे मेघ मड़इया पर
हँसे धरती मुरवा…”

रोपनिये पर धरती के हरियरी आ मुस्कान निर्भर करेला। रोपनी गीत एक देने रोपनहारिन के काम के प्रति उत्साह पैदा करेला, ओहिजे दूसर तरफ ओकर पीड़ा के पी जाला। समुचा बधार संगीतमय हो जाला, प्रकृति गावे लागेला, धान के बिचड़ा ठुमका लगावे लागेला अइसन सुखमय परिवेश के वर्णन कविता के खुबसूरती में चार चान लगा देत बा –

” गीतहारिन सुर उठवली
दूसरी पाँत उत्तर देवे लागल
तीसरी पाँत हँसी में घुल गइल
पूरा बधार
एक साथ गावे लागल
मेघ ठहर गइलें
बगुला आँख मूँद के सुनत रहल
मेंढ़क अपन ढोल पीटे लागल
बयार ताल देवे लागल
धान के बिचड़ा
जइसे गीत सुनके अउरी हरियर हो उठल। “

धरती पर अइसन परिदृशय देखि आकाश झुक जात बा त कवनो आश्चर्य के बात नइखे। बिहन उखाड़े से लेके रोपनहारिन के हथेली तक पहूंचावे के यात्रा के वर्णन देखल जाय –

” बेहन से बिचड़ा उखड़ल
जड़ में माटी लिपटल रहल
जइसे माई छोड़त बेरा
बेटी के अँचरा थाम लेत होखे
मूँठा बँधल
अंटी सजल
गड्डी बनल
पंजा हरियर हो गइल
पूंजा हथेली में धड़कत रहल
रोपनहारिन पाँत बाँध के खड़ी भइली
धरती साँस रोकले रही
आकाश झुक के देखे लागल। “

(5.)

कादो के कोठ में गड़ल बिचड़ा अन्न के पहिला अक्षर से अगहनुआ सपना के जन्म देला। रोपनी के हथेलिये के आ श्रम के कमाल धरती के अन्न के जनमघर में बदल देला। एह यथार्थ पर कवि के स्वर –

” पहिलका बिचड़ा
जब कादो के कोख में गड़ल
ओही घरी
धरती के माथ पर
अन्न के पहिलका अक्षर लिखाइल
रोपनियों की लोकगाथा
पहिलका बिचड़ा गड़ते ही
कादो मुसुकाकर बोला,
“अब हम माटी ना रहीं
अन्न के जनमघर बन गइनी।”

रोपनी के धरती पर रेघरिआवल एगो कला ह, रोपनहारिन के हाथ से उकेरल। ओह माटी आ हाथ के कलाकृति पर कवि के सब्द में चित्रकारी –

” जइसे हरियर नदी
धीरे-धीरे धरती पर उतर रहल होखे
सखी के अँगुरी
सखी के अँगुरी से ताल मिला रहल रहे
कवनो हड़बड़ी ना
कवनो धक्का ना
बस एक लय
जइसन चाक पर घूमत कुम्हार के हाथ
जइसन चरखा पर नाचत सूत
जइसन माई के कोख में पलत जिनगी।”

रोपनी आ धरती, रोपनी आ श्रम के संबंध पर कवि के नजरिया –

” चोभना
कवनो पौधा गाड़ना ना रहे
ऊ त धरती के माँग में
हरियर सिंदूर भरना रहे
गड़ाना
कवनो मेहनत भर ना रहे
ऊ त भूख के विरुद्ध
सभ्यता के पहिल प्रतिज्ञा रहे
रोपा पर रोपा
बिचड़ा पर बिचड़ा
धरती अपना अँचरा में
सपना सहेजत चल गइल। “

भूख के विरोध सभ्यता के पहिल प्रतिज्ञा के संज्ञा कवि रोपनी के दे रहल बा। रोपनहारिन के हथेली के श्रम के एह से बड़ सम्मान का होई?

पानी आ पसीना से हरियाइल धरती से सोना उपजावे के औजार रोपनहारिन के श्रम के महिमा आ मेघ के मांदर पर संगीत के उठत लहरी, प्रकृति से बइठावत तालमेल के कविता में बुनावट देखीं –

” पुरवइया
भींजल केस सुखावत
धीरे-धीरे पाँत के माथ सहलावे लागल
पछिवइया
दूर अमरइया में बइठ
ई हरियर चमत्कार निहारत रहल
मेघ फेर उमड़लें
झमाझम बरखा फूट पड़ल
पानी आ पसीना
एके देह में मिल गइल
केहू ना बूझ पवलस
का बरिसात भींजावत बा
कि मजूरिन के माथ से टपकत श्रम?
रोपनहारिन हँसली
कछौटा भींज गइल
खोमड़ी से धार टपके लागल
छपवा पर मेघ ढोल बजाय लगल
बाकिर गीत ना रुकल
गीतहारिन टेर उठवली,
“रोपऽ बहिनी रोपऽ
धुरवा हरियर होई
भूखल दुनिया देखिहे
धान सोनवा होई…”

खेत के रंगमच पर रोपनहारिन के गीत सुनि प्रकृति गुनगुनाये लागले। गीत के लय पर मय प्राणी ताल देवे लागले। एह रंग में रंगल प्रकृति के रूप देखे जोग बा –

” मेंढ़कन के टर्राहट
ढोलक बन गइल
झिंगुर मंजीरा बजावे लगलें
हवा बाँसुरी फूँके लागल
बरखा गवैया बन गइल
कादो रंगमंच बन गइल
आ रोपनहारिन
धरती के पहिल कलाकार
लीह टेढ़ ना पड़ल। “

रोपनहारिन के श्रम आ संग चले के सीख पढ़ावत कविता के अंश –

” पाँत कबहूँ टूटल ना
कतार इहे सिखावत रहल
संगे चलल ही
सबसे बड़का बुद्धि ह
एगो रोपनहारिन
थाक के सीधा भइल
दूसरी हँस के कहली,
“अरे बहिनी!
धान बाद में थाकी
हमनी पहिले काहे?”

(6.)

गाँव आ लोक मेल – मिलाप, आपसी प्रेम आ सहजीवन रोपात खेत के मेंड़ पर देखे के मिलेला। ओकर चित्रांकन करत कवि का कहत बा –

” एगो के कलेवा
सबकर भोज बन गइल
एही त गाँव रहे
एही त लोक रहे
जवना थरिया में
चार गो लुकमा रहे
ओही में आठ गो हाथ समा गइल
खइला के बाद
केहू सुस्ताइल ना
काहे कि
धान अबहियो रोपे के रहे।”

रोपनहारिन के श्रम आ साहस के बखान करत कविता –

” दिन माथ चढ़ल
सुरुज ताव देवे लागल
उमस देह से लिपट गइल
बाकिर रोपनहारिन के चाल
कबहूँ सुस्त ना पड़ल
ओकनी के कमर झुकल जरूर
बाकिर मन कबो ना झुकल।”

बूढ़ पुरनिया के जीवन अनुभव तपल – तपावल होला। रोपनहारिन के श्रम के महता बतावत कविता –

” बूढ़ दादी
ओसारा से देखत-देखत बुदबुदइली,
“ई रोपनिहारिन ना रहितीं
त धरती बाँझ हो जात।”

रोपल खेत, धान, किसान, आ ओकर परिवार के भविष्य के संबंध के चित्रित करत कविता अंश –

” रोपल खेत
दूर
से देखे में
जइसे हरियर अक्षरन से भरल पोथी लागे
किसान
बहुत देर ले
ओह खेत के ताकत रहल
ओकर आँख में
धान ना
अपना लइका के भविष्य डोलत रहे।”

धरती के कोख में सभ्यता आ मनई के सपना रोपे वाली रोपनहारिन के हथेली के दर्जा सबसे ऊपर बतावल गइल बा जे कृषक संस्कृति के अकाट्य सांच ह, कविता एह सच्चाई के स्वीकार कइले बा-

” ओह घड़ी
कवनो राजा महान ना रहे
कवनो सिंहासन ऊँच ना रहे
सबसे ऊँच रहे
कादो से सनी
रोपनहारिन के हथेली
काहे कि
ओही हथेली
रोटी लिखत रहे
ओही हथेली
सभ्यता बोवत रहे
ओही हथेली
धरती के कोख में
मनुष्य के सबसे पुरान सपना
बार-बार रोपत रहे।”

सावन के भींजल देह, अगहन के सोना पँखी उजास, धान के बाली मे सोना के बारिश जस प्रतीक धान के खेत में जब दिखी त स्वभाविक बा धान के महमह सुवास उठि अगहन के आगाज सुनइबे करी। एगो विरल अगहन गाथा –

” सावन के भींजल देह
धीरे-धीरे अगहन के सोनपाँखी उजास में बदल गइल
जे कादो काल्ह तक
रोपनहारिन के गोड़ पकड़ले रहल
आज उहे कादो
धान के बाली में सोन बरसावत रहल
पुरवइया फेर अइल
ए बेर ओहिजा पानी के गंध ना
पकाइल धान के महमह सुगंध बहत रहल।

(7.)

अगहन के आगाजो के संपुष्ट एगो अनुभवी किसाने करेला धान के बाली आ स्वाद चखिके। धान के बाली के त दुलहिन से तुलना सुंदर ढंग से देखे के मिलत बा साथे इहो सीख मिलत बा कि फरल डाढ़ अकड़े ना।

” धान के बाली
दुलहिन के माँग जइसन भरल रहे
हर पौधा
आपन सिर झुकवले रहे
फलल डार कबो अकड़त नइखे
बूढ़ किसान
मुट्ठी भर बाली तोड़ि
दाना चबाइलस
ओकर आँख चमक उठल
धीरे से कहलस,
“एह बरिस धरती माई निराश ना कइली।”

कविता में एही तरे कटनी, खरिहान, दंवरी, ओसावन जस खेती से संबंधित एक – एक चीज पर सूक्ष्म दृष्टि राखत कवि एक – एक क्रिया के परत दर परत एह तरह से खोले में सफल बाड़े। बुझात बा कागज पर कविता ना पढ़ि खेत – खरिहान में किसान संग बइठ किसानी के मजा ले रहल बा आदिमी।

किसान खातिर अन्न का ह? संबंधित कविता के अंश-

” किसान
दूनो हथेली में धान उठा के
आँख से लगा लिहलस
ई पूजा रहे
ई आरती रहे
ई प्रणाम रहे
घर पहुँचल
नवका धान।”

अन्न के घरे पहुंचत घर के परिवेश बदल जाला। ओखरी, मूसल, चूल्हा, चउकी से संगीत गूंजे लागेला। सह- अस्तित्व के सिद्धांत मुखर हो जाला। पहिले जीव – जंतु, धरती माई, देवता, ब्राह्मण के हिस्सा निकाल दिआला। कवि के एह संबंध में भाव –

” ओखरी हँस पड़ल
मूसल गावे लागल
चक्की घूमत-घूमत
अन्न के गीत रच देलस
चूल्हा
नवका धान के भात सूँघके
धुआँ में असीस लिखे लागल
पहिलका भात
धरती माई के
दूसरका
गोरू-बछिया के
तीसरका
चिरई-चुरुंग खातिर
चउथका
घर के लोगन खातिर।”

कृषि संस्कृति सामाजिक सरोकार आ संयुक्त परिवार के पोषक ह। कविता में ओकर ई रूप देखल जा सकेला –

” एह गाँव में
अन्न अकेले ना खाइल जाला
अन्न बाँटल जाला
अधिया के बात उठल
बटाई के हिसाब खुलल
चाहाराम के पुरनका रिवाज याद पड़ल
कवनो के हिस्सा बेसी
कवनो के कम
तब बूढ़ किसान धीरे से कहलस,
“धान बाँट लिह
बाकिर माटी मत बाँटिहऽ
माटी बँटते
मनुख बँट जाला।”

सभ्यता के विकास के कहानी के जड़ में किसानी आ कविता के नायिका रोपनहारिन के हथेली बा, कलम के पहिले कुदार रहल बा। तब त कवि कहत बाड़े-

” तब बुझाइल
सभ्यता
राजा के तलवार से ना बचल
ना महल से
ना दरबार से
सभ्यता बचल
कादो से सनी ओह हथेली से
जे बिचड़ा रोपत रहल
इतिहास
कलम से पहिले
हल के फाल लिखलस।”

(8.)

कृषक संस्कृति जबले जिंदा रही तबले लोक संस्कृति ना मरी ई सांच ह। एस सत्य के देखीं कवना ठसक के साथ कवि उकेरत बाड़न –

” एह से
जबले आद्रा आकाश पर लौटत रही
जबले पुरवइया हरियर गंध उड़ावत रही
जबले बियार से बेहन जनमत रही
जबले बिचड़ा कादो में गड़त रही
जबले रोपनहारिन गीत गावत रही
जबले दंतेली चमकत रही
जबले खलिहान हँसत रही
जबले कोठार धान से भरत रही
तबले ई धरती
भूख से हारब ना
तबले लोक
मरल ना मानी
तबले किसान
सूरज के सबसे पुरान साथी रही।”

ओही क्रम के आगे बढ़ावत अन्न आ रोपनहारिन के महिमा गावत कवि के स्वर –

” आ तबले
अन्न के हर दाना
ई गवाही देत रही
मनई के सबसे बड़का ग्रंथ माटी ह
सबसे बड़का मंत्र श्रम ह
सबसे बड़का देवता अन्न ह
आ सबसे बड़की कविता
रोपनहारिन के भींजल हथेली।”

कविता किसानी, माटी आ रोपनहारिन के बखान ह। माटी के महिमा देखीं एगो किसानिन के नजर से –

” मेड़ पर बइठल एगो बूढ़ माई
धरती के सहलावत बुदबुदाइल
“ए मटिया!
तोहरे कोख से
हमनी जनमनी
तोहरे कोख से
अन्न जनमेला
आ आखिर में
हमनी फेर तोहरे में समा जइब।”
——

” गाँव के बूढ़ कहेला,
“जे घर में माटी के गंध नइखे
उ घर अभी घर कहाँ भइल!”

रोपनहारिन के श्रम के प्रतिफल खेती के कण – कण में बसल रहेला। कवि ओकर गुनगान करत थाकत नइखे. थाके काहे ओकर पसीना के गंध त ओकरा हर चीजे में दिखाई पड़त बा। तब त कहत बा-

” ओकर हथेली पर
आजुओ कादो के गंध बसल रहे
उहे गंध
घर के रोटी में उतर जाले
उहे गंध
भात के भाप में महकेला
उहे गंध
दूध के मिठास बन जाले
उहे गंध
बचवन के हँसी में खिलेला।”

लोक के किसान संस्कृति के जुड़ाव के देखत कवि के सबदन में – माटी, किसानी, श्रम आ रोपनहारिन के गान –

” आ तब
बुझाइल
धरती के सभसे पहिलका विश्वविद्यालय
खेत ह
ओकर सभसे बड़ पुस्तकालय
कोठार ह
सभसे बड़ पाठशाला
खलिहान ह
सभसे बड़ गुरुकुल
रोपनी के पाँत ह
सभसे बड़ शिक्षक
किसान ह
सभसे बड़ शिक्षिका
रोपनहारिन ह
सभसे बड़ शास्त्र
माटी ह
सभसे बड़ भाषा
पसीना ह
सभसे बड़ अक्षर
बीज ह
सभसे बड़ कविता
धान के हरियर लहर ह
सभसे बड़ संगीत
रोपनी-गीत ह
सभसे बड़ पूजा
बिचड़ा रोपल ह
सभसे बड़ आरती
पहिलका कौर धरती के अर्पण कइल ह
सभसे बड़ तपस्या
भूख के खिलाफ खेत में उतरना ह
सभसे बड़ विजय
कवनो युद्ध जीतल ना
बलुक
एगो दाना उगा लिहल ह।
———
” सभ्यता आजुओ
ओही भींजल पाँत में खड़ी बा
जहँवा रोपनहारिन
कमर झुकवले
माथ पर मेघ
पाँव में कादो
हथेली में बिचड़ा
आ कंठ में गीत लेके
भविष्य रोपत रहेली।”

रोपनहारिन के हथेली के गाथा अनंत बा। कागज लिखे ना ओरिआई। तब त कहहीं के पड़ी कवि के सबदन में –

” रोपनी खाली खेती नइखे
रोपनी धरती के धड़कन ह
रोपनी खाली अन्न नइखे
रोपनी मनुख के पुनर्जन्म ह
रोपनी खाली लोकगीत नइखे
रोपनी पूरा लोक-सभ्यता के अमर महाकाव्य ह।”

(9.)

केहू के कहल ह कि ‘ अच्छी कविता वही है जिसमें चित्रात्मकता हो।’ ‘ रोपनहारिन के हथेली ‘ में कविता के ई गुण भरपूर मिलत बा। एह कविता में माटी के चित्रकार गोलेन्द्र किसान संस्कृति के बड़ी शालीनता आ खुबसुरती से बड़े कैनवास पर अंकित कइले बाड़े। कविता एक साथे किसान, माटी आ स्त्री विमर्श पर गहराई से बाति करत बा। कवि पाश के कहल ह ‘ सबसे खतरनाक है सपनों का मर जाना।’ कवि संपूर्ण कविता में सपना के कहीं मरे नइखे देत। सकारात्मक पक्ष कविता के विशेष गुण बा।समीक्ष्य कविता आपन शीर्षके से एगो वैचारिक दिसा के ओरि संकेत करत बा।एह कविता पर बतकही खातिर कविता में अतना कुछ बा कि एगो किताब के कहो कई गो ग्रंथ लिखा जाई, बाकिर कवनो आलेख के एगो सीमा होला।कविता लमहर बा बाकिर कतहीं उबाऊ नइखे। रससिक्त कविता के प्रवाह आ लोक से जुड़ाव एह कविता के प्राण बा। कविता में भाषा के सादगी आ बिंब – प्रतीक के सौंदर्य पाठक के भीतर तक प्रभावित करे में सक्षम बा। किसानी संस्कृति के अनेक पक्ष बा ओह में से कुछ पक्ष पर कविता बड़ी सूक्ष्मता से बात करत बिया आ अपना कथ्य के प्रस्तुत करे में कवि सफल रहल बा। कवि विवेक के साथ एह कविता के सबदन के चयन आ संयोजन कइले बाड़े, जे कविता के जीवंत बनावे में सहायक बा। ई कविता हमनी के कृषक संस्कृति के समय आ समाज के देखे – समझे के दृष्टि प्रदान करत बा।कवि के साहित्यिक चेतना आ संवेदनशीलता के साक्ष्य कविता खुद बा।कविता में ना कतहीं आडंबर दिखत बा, ना कहीं आत्ममुग्धता, हँ, सादगी के चादर ओढ़ले कवि के विचारशील शैली आ दृष्टि जरूर दिखाई पड़ रहल बा, जे कविता के एगो अलग विशेष पायदान पर खड़ा कर देत बा। इहे एह कविता के खुबसूरती बा। इहे एह कविता में एगो अलग सुवास पैदा करत बा।अंत में त गोलेन्द्र के एह कविता देखत इहे कहब कि लोक आ माटी से संवाद करत ई कविता एगो जिंदा कविता बा जहमें जीवन से संवाद करत भरपूर संवेदना बा। ई देख हम बिसवास से कह सकींला आवे वाला समय में गोलेन्द्र पटेल के आवाज अउर बुलंद होखी आ उनुकर माटी गाथा के गूंज दूर ले सुनाई पड़ी।

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कनक किशोर
राँची, मोबाइल – 9279200401

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