पाला मार के
- डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

सोस्ती सिरी पत्री लिखी पटना से-62

आइल भोजपुरिया चिट्ठी

पाला मार के

लागता कि ठंढा के आगम हो गइल बा। भोरे-भोरे पुरुब आरी का आसठि पर बइठल नीक लागता। लइका भिनसहरे खेले वाली आपन जगहि बदल देले बाड़न स। आजुओ लभेरन टाइमे प अइले बाकिर सुकसुकाइल लउकले। बतवले कि काल्हु ठंढा लागि गइल रहल हा। साँझिए से जे छींक आवत रहल हा कि मत कहीं। अदरख आ मरिचि मिलाके तुलसी के गरमागरम चाह पियलीं हा आ दूध में मिलाके घीव, गुड़ आ हरदी के काढ़ा पियलीं हा, तब तनी बहरी निकले लाएक भइल बानी। सभके बाँचिके रहे के बा। ठंढा जब आवेला आ जब जाए लागेला, तब बड़ा सावधान रहेके परेला।
“हँ हो, जब ठंढा बरियार गिरे लागी तब त बिना कहलहीं सब केहूँ गरम कपड़ा पहिरे-ओढ़े लागी।” काकी मुसुकात कहली।
बड़का नतिया के काकी लभेरन के पानी पियावे के कहली आ हिदायतो दिहली- “पानी पाला मारिके ले अइह।”
अतने में बबुआ आके मइया से पुछलसि कि पानी के पाला मारल का होला, मम्मी पुछली हा। काकी कपारे हाथ ध लिहली- “अब बताव! लागता महरानी जी इंगलैंड से आइल बाड़ी। जा कहि दीह कि सुसुम पानी चाहीं।”
जब बड़का बबुआ सुसुम पानी ले के आ गइल त छोटका नतिया के मुँह खुलल। ओकरा भीतर जिज्ञासा के हलचल रोकाए का मान के ना रहे। ऊ अपना मइया से पुछलसि- “मइया, पाला के कइसे मारल जाला?”
काकी बोलली- “अब ना ल. अउर बनि गइल, ई सुनऽ लभेरन?”
लभेरन बतावे लगले- “ठंढा पानी के तनी ठंढापन निकाले खातिर पानी के हलका गरम क दिहल जाला। ओकरे के पाला मारल कहल जाला।”
अब काकी जोरली- “मलाई मारिके चाह माङल नइखऽ सुनले लोग?”
बड़का नतिया से ना रहाइल- “मलाई मारिके चाय में दूध में से मलाई निकालल ना जाला, उलुटे अउर डाल दिहल जाला। एही से नु मम्मियो कंफ्यूज रहली हा!”
काकी के अब जाके असली समस्या बुझाइल। ऊ लभेरन ओरि तकली। लभेरन अभी बोलते, ओकरा पहिलहीं छोटका बबुअवा पुछलसि- ‘’सुसुम का होला?”
अब लभेरन समुझावे शुरू कइले। “भोजपुरी में ‘सुसुम’ के अर्थ होला- गरम, उष्ण भा सहोष्ण । सहोष्ण माने अइसन गरमी जवना में ताप त होखे, बाकिर ऊ बहुत तेज भा असह्य ना होखे माने सहाउर गरमी।
एही से काकी सुसुम पानी मङली हा। जब केहूँ के ढंढा लागि जाला त ओकरा ठंढा पानी भा खाना ना रूचेला आ जाड़ा में अइसहीं केहूँ ठंढा खाइल-पियल ना चाहे। गरमियो में त केहूँ गरम पानी पियल पसंद ना करे, ओकरा के ठंढे पानी चाहीं।”
काकी बोलली- “हमार दिमाग अभी भोजपुरी का ‘मारल’ शब्द पर अँटकल बा। अब बतावऽ ई अजगुत बात! ‘पाला मारि के’ के माने हो गइल तनी गरम कऽ के, बाकिर जब कहल जाई कि “आलू का खेत में पाला मारि दिहलसि” त ओकर माने भइल कि तुषार गिरला से आलू के फसल नष्ट हो गइल।”
लभेरन बतवले- ‘पाला मारि के’ एगो मुहावरा हटे आ एहसे ओकर विशेष अर्थ होला। बाकिर ओकर माने ठंढे मारल होई, फसल का मामला में ठंढा मरला से बरबादी के अरथ लगावल जाई। कड़ाका के ठंढ आ ओस के जमल रूप (तुषार) का चलते खेती-किसानी भा हरियर चीज के झुलस के बरबाद हो गइल- एकर विशेष अर्थ भइल। असल में भोजपुरी के ‘मारल’ शब्द श्लिष्ट शब्द हटे, संदर्भ का हिसाब से ई अलगा-अलगा अर्थ में प्रयुक्त होला। ठंढ मरला भा पाला मरला के माने भइल-  ठंढा के खराब असर। बाकिर ‘पाला मार के’ मुहावरा के माने भइल- ठंढापन के खतम कइल। एगो अउरी मुहावरा बा- तेल मारल। एकर माने भइल ‘चापलूसी कइल’। ‘मलाई मारल’ मुहावरा के माने भइल- मजा लिहल, मजे में आ जसहीं कहबि कि ‘मलाई मारि के’ त एह मुहावरा के अर्थ हो जाई- अउरी मलाई डालल।”
भोजपुरी भाषा के एगो बहुते बड़हन खूबी ई बा कि एह में एकहीं क्रियापद अलगा-अलगा संज्ञा, भाव आ संदर्भ के सङे मिल के अइसन जादू बिखेरेला कि पूछीं जनि। साधारन अर्थ में ‘मारल’ (मारे) के मतलब खाली हाथ-गोड़ भा लाठी चलावल बुझाला, बाकिर जब ई भोजपुरिया मिजाज में ढरेला, त लाठी के मार कहाँ दो चलि जाला आ मानवीय संवेदना, चल्हाकी, भूख, थकान जइसन जिनिगी के तरह-तरह का रंगन के उभारि के देखावे लागेला। कुछ बानगी देखल जाउ।
1. पेट पर लात मारल- माने कवनो गरीब के रोजी-रोटी छीन लिहल भा कमाई पर लात मारल। उदाहरन खातिर- “कवनो मजूरा के हक दबा के ओकरा पेट प लात मत मार।”
2. डाँड़ी मारल- माने तौल में बएमानी कइल, तराजू के झुका के कम दीहल। एगो उदाहरन देखीं- “ओह बनिया का दोकान से जिनिस मत लीहऽ, ऊ डाँड़ी मारे में माहिर हटे।”
3. गप्प मारल- बइठ के खाली लंबी-चौड़ी हाँकल।
4. पलटी मारल- अपना बात से मुकर गइल भा अचानक दल बदल लिहल।
5. मन मारल- अपना साध, सवख भा इच्छा के मजबूरी में दबा लिहल।
6. झपकी मारल: बइठले-बइठल थोरे देर खातिर आँख बंद हो गइल, नीनि के हलुक झोंका।
7. आँख मारल- गुप्त इशारा कइल।

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