बतकुच्चन – १०४
“डोलिए में अइनीं, डोलिए में गइनीं, डोलिए में रहि गइल पेट. ए सासु जी तोहरे किरिया सईंया से नाहीं भेंट.” एक जमाना रहुवे छायावादी कवियन के. बात के घुमा के अइसे कहीहें कि कुछ लोग बूझी कुछ ना. कविता के खजुराहो जस होला...
Read More“डोलिए में अइनीं, डोलिए में गइनीं, डोलिए में रहि गइल पेट. ए सासु जी तोहरे किरिया सईंया से नाहीं भेंट.” एक जमाना रहुवे छायावादी कवियन के. बात के घुमा के अइसे कहीहें कि कुछ लोग बूझी कुछ ना. कविता के खजुराहो जस होला...
Read Moreकवन अभागा गाँजा बोवलसि हो/पियवा बउरा गइलें. कवन पापी घोर के पियवलसि हो/पियवा बउरा गइलें. ना ना, हम...
Read Moreपिछला हफ्ता एक जने के पटावे खातिर दोसरा जने के पठा दिहल गइल. जिनका के पठावल गइल से ओह राज्य के पालक रहलें आ लोग कहत बा कि एह बहाने उनुका के पटावे के कोशिश कइल गइल बा जिनकर सहारा अगिला साल के चुनाव का बाद लेबे के जरूरत पड़ सकेला....
Read More“संतोख अतने बा / कि गाँव अपना में अझुराइल / अपने में परेशान / अपने में मगन / अतने में गील / कि हिनिके उड़ा देब! / हुनके भठा देब! / उनकर मामर हेठ करब! / बहुत जल्दिये गोटी सेट करब!!” ना, ना. गलत समुझला के जरूरत नइखे....
Read Moreपिछला कुछ महीना से फाँसी का फैसला पर गृहमंत्रालय अतना फदफदा गइल बा कि ताबड़तोड़ फाँसी सकारे के सलाह दिहले जात बा. अब एह बात पर बहुते कुछ मन करे लागल कहे सुने के. बाकिर आजु के हालात अइसन हो गइल बा कि बतियावे के आजादी भले होखे बतावे...
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