Tag: कविता

राजीव उपाध्याय के तीन गो कविता

(1) मन के चाकरी मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी अब का करीं, हमके अब त बता द। मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥ एने.ओने जानी, कुछू ना बुझाला, हवे ई ओसारा कि ह ई सिवाला। मन के चाकरी कइनी जीवन सगरी॥ खेत हवे कि बारी, कि गाँव के दुआर, नदिओ ना...

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रहे एगो आस रे…

– ओमप्रकाश अमृतांशु डहके मतरिया रे , छछनेली तिरिया, बाबुजी बांधत बाड़न, बबुआ के लाश रे, जिनिगी के जिनिका पे रहे एगो आस रे. ढरकत लोरवा के छोरवा ना लउके, भइल सवार खून माथवा पे छउंके, पारा-पारी सभेके धोआइल जाता मंगिया, बाबुजी...

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महानगर अउर जिलन के, का बतलाई हाल?

– नर्वदेश्वर पाण्डेय देहाती मंदिर में मंथन भइल, मिली जाम से मुक्ति? जाम-झाम क नाम पर, आपन-आपन युक्ति.. नगर निगम में धांधली, गेट में ताला बंद. लाठी चार्ज में बहल लहू,ऊपर से शांतिभंग.. महानगर में रोज मिलें, मरल-परल नवजात....

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नवगीत

– गंगा प्रसाद अरुण संता, जाने कइसन महभारत फेर आइल बाटे चकराबिहू रचाइल बाटे ना! केकर कइसे गोड़ कबारीं केकरा के कइसे हम जारीं डेगे-डेग इहाँ पर लाखा-घर सिरजाइल बाटे चकराबिहू रचाइल बाटे ना! अनकर अस्तर-सस्तर बोले बीचे धरम-जूझ...

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लईका सयान हो गइल

– विजय मिश्र लइका हनेला जवाब, अब सयान हो गइल बहू अइली घरे, अलगा चुहान हो गइल. पहिला रिस्ता टूटल जाता, नवका रोज धराता ननिअउरा त याद ना आवे, बढ़ल सढ़ुआ नाता. माई बाबू काटे, ससुररिया परान हो गइल बहू अइली घरे, अलगा चुहान हो...

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